
कई दशकों की लंबी लड़ाई के बाद हमें आज़ादी मिली। इस आज़ादी की कीमत हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने लाठियां खाकर, तकलीफ़ें झेलकर और अपने प्राणों की आहुति देकर चुकाई। जिस उम्र में लोग घर बसाने और सपने सजाने में लगते हैं, उस उम्र में हमारे युवाओं ने सीने पर गोलियां खाईं। उन्होंने खुशी-खुशी अपना पूरा जीवन देश के नाम कुर्बान कर दिया।
वे निडर थे — अपनी स्वतंत्रता से देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ते थे। आज अगर हम चाहें भी, तो शायद उस गहरी देशप्रेम की शिद्दत अपने भीतर पैदा नहीं कर सकते। क्यों नहीं कर सकते? इस सवाल के अलग-अलग जवाब हो सकते हैं, लेकिन सच यह है कि हम “स्वार्थी” हो गए हैं।
अब हमारा ध्यान बस मेरा परिवार, मेरी तरक्की, मेरा करियर, मेरे लोग, मेरा समाज तक ही सीमित हो गया है। यह नहीं कि आज देश के लिए बलिदान देने वाले लोग नहीं हैं — हैं, लेकिन क्या हमने सारी जिम्मेदारी सिर्फ उन्हीं के कंधों पर छोड़ दी है?
आगे बढ़ना प्रगति है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि जो पीछे छूट गया, वह अब मायने नहीं रखता। और स्वतंत्रता का मतलब यह भी नहीं होना चाहिए कि हम खुदगर्ज हो जाएं।
सच्ची प्रगति वही है जब हम सेल्फलेस होकर अपने साथ दूसरों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा दें। स्वतंत्रता का सही अर्थ है — बिना डरे जीना, बराबरी से खड़े रहना, और दूसरों को भी उसी आज़ादी का हक़ देना।

















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