इतिहास में पहली बार ऐसी अकर्मण्यता पांचवीं-आठवीं पास छात्र और अभिभावक एडमिशन को लेकर बेहद चिंतित, मनेंद्रगढ़ और कोरिया जिले के वनांचल क्षेत्रों में भी बच्चे झेल रहे हैं सिस्टम की बेरुखी
नई पहल न्यूज नेटवर्क। रायपुर। प्रदेश में कल से नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने जा रहा है और स्कूलों में ‘शाला प्रवेश उत्सव’ की तैयारियां ज़ोर-शोर से चल रही हैं। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे शिक्षा विभाग की एक ऐसी गंभीर लापरवाही सामने आई है, जिसने प्रदेश के लाखों बच्चों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है। सवाल उठ रहा है कि बिना मूल अंकसूची (मार्कशीट) के पांचवीं पास बच्चे छठवीं में और आठवीं पास बच्चे नौवीं में प्रवेश कैसे पाएंगे? आश्चर्य की बात है कि केंद्रीकृत परीक्षा प्रणाली के तहत शासकीय और मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों के पांचवीं और आठवीं के नतीजे घोषित हुए ढाई महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आज तक प्रदेश के 7 लाख से अधिक बच्चों को उनकी मूल अंकसूची नहीं मिल सकी है। छात्र और अभिभावक एडमिशन को लेकर दर-दर भटक रहे हैं। सबसे ज्यादा परेशानी उन छात्रों को हो रही है जो आगे की पढ़ाई के लिए प्रदेश से बाहर जाना चाहते हैं या बेहतर स्कूलों में दाखिला लेना चाहते हैं।

मनेंद्रगढ़ और कोरिया जिले के बच्चे सबसे बड़े शिकार, रुकी टी.सी.
सिस्टम की इस बेरुखी और अकर्मण्यता का सबसे बुरा असर मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर और कोरिया जैसे सुदूर वनांचल जिलों के बच्चों पर पड़ा है। यहाँ के सैकड़ों ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के बच्चे मूल अंकसूची न मिलने के कारण आगे की पढ़ाई के लिए आवश्यक दस्तावेज नहीं जुटा पा रहे हैं। स्थिति यह है कि बिना मूल अंकसूची के स्कूलों द्वारा स्थानांतरण प्रमाणपत्र (टी.सी.) भी जारी नहीं किया जा रहा है। ऐसे में प्रवेश उत्सव के नाम पर किए जा रहे आयोजन महज़ एक राजनैतिक इवेंट बनकर रह गए हैं, जबकि धरातल पर छात्र परेशान हैं।
नया सत्र शुरू, पर शिक्षा विभाग मौन, रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ नीचे से तीसरे स्थान पर
शिक्षा विभाग ने पूरे प्रदेश में कक्षा पांचवीं और आठवीं की परीक्षा एक साथ ली थी और अप्रैल में ही इसके परिणाम घोषित कर दिए गए थे। बावजूद इसके, ढाई महीने बाद भी मूल अंकसूची स्कूलों तक नहीं पहुंची है। इस उदासीनता का असर राज्य की पूरी शिक्षा व्यवस्था पर दिख रहा है।
गिड़गिड़ाता स्तर: एकीकृत जिला सूचना प्रणाली (UDISE) द्वारा जारी वर्ष 2024-25 की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, छत्तीसगढ़ शिक्षा के स्तर में देश में नीचे से तीसरे पायदान पर खिसक गया है। रिपोर्ट बताती है कि भाषा का स्तर -3 और विज्ञान का स्तर -5 तक गिर चुका है।
शिक्षकों की नियमित भर्तियां रुकी हुई हैं और स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं जैसे शौचालयों का भारी अभाव है। वहीं शिक्षकों को शैक्षणिक कार्यों के बजाय गैर-शैक्षणिक ड्यूटी जैसे मवेशी गणना और अन्य कार्यों में उलझाया जा रहा है।
RTE सीटों में भारी कटौती, गरीबों की शिक्षा पर संकट
आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में पहले शिक्षा का अधिकार (RTE) के तहत निजी स्कूलों में गरीब बच्चों के प्रवेश के लिए लगभग 80 हजार सीटें हुआ करती थीं, जिसे इस साल घटाकर मात्र 21,975 कर दिया गया है। यानी आरटीई की सीटों में सीधे 80 प्रतिशत की कटौती कर दी गई है। इससे पहले राज्य में कई स्कूलों को बंद किया गया और नए सेटअप के नाम पर सभी 53 हजार स्कूलों में शिक्षकों के न्यूनतम पदों की संख्या में एक-एक की कटौती की गई।
जनता और अभिभावकों की मांग है कि सरकार और शिक्षा विभाग लोक-लुभावन उत्सव मनाने से पहले तत्काल पांचवीं और आठवीं के बच्चों को मूल अंकसूची उपलब्ध कराए, ताकि बच्चों का भविष्य अंधकार में जाने से बच सके।
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