सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: क्या आवारा कुत्ते अब रहेंगे कैद ? इंसानियत और सुरक्षा के बीच नई जंग
किसी राष्ट्र का मूल्यांकन इस बात से नहीं होता कि वह शक्तिशाली लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इस बात से होता है कि वह निःशब्द और असहायों की कितनी रक्षा करता है।

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली और एनसीआर से आवारा कुत्तों को हटाकर स्थायी शेल्टरों में रखने के निर्देश ने व्यापक बहस को जन्म दिया है। यह फैसला मानव जीवन की रक्षा के नाम पर लिया गया है, लेकिन इसके पीछे छिपी बड़ी विफलता उजागर होती है—मानव कहलाने वाले उच्च प्राणी करुणा, जिम्मेदारी और दूरदर्शिता का परिचय देने में नाकाम रहे हैं। जानवरों से गहरा जुड़ाव रखने वाले व्यक्ति के तौर पर मुझे सिर्फ यह देखकर सुकून मिलता है कि वे स्वतंत्रता के छोटे-छोटे पल जी पाते हैं। कुत्तों को सड़कों पर घूमते देखना और उनकी आज़ादी के पलों को साझा करना सामंजस्य का अहसास कराता है। यही कारण है कि यह फैसला असहनीय रूप से क्रूर प्रतीत होता है।
फैसला और उसका असर
11 अगस्त 2025 को कोर्ट ने निर्देश दिया कि दिल्ली-एनसीआर से आवारा कुत्तों को हटाकर स्थायी शेल्टरों में रखा जाए। इसका आधार हाल में बढ़े कुत्तों के काटने की घटनाएं और रेबीज़ से हुई मौतें थीं। निस्संदेह, सार्वजनिक सुरक्षा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि मानव सुरक्षा और पशु संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं हैं। ग्रेटर नोएडा प्रशासन ने बड़े शेल्टर बनाने की योजना की घोषणा की है, मगर पशु कल्याण संगठनों का मानना है कि यह अव्यावहारिक और अमानवीय होगा। भीड़भाड़, संसाधनों की कमी और कुप्रबंधन से यह और बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है। अनुभव बताता है कि कुत्तों को बड़े पैमाने पर हटाना न तो उनकी संख्या नियंत्रित करता है और न ही समस्या का स्थायी समाधान देता है।
मानवता का सवाल
मनुष्य को अक्सर उच्च प्राणी कहा जाता है—केवल बुद्धिमत्ता के कारण नहीं, बल्कि निःस्वार्थ व्यवहार की क्षमता के कारण। जानवरों को “निचला” माना जाता है क्योंकि वे नैतिक निर्णय नहीं ले पाते। लेकिन इस फैसले में वही नैतिक श्रेष्ठता खोती दिखाई देती है। हमारा कानून स्वयं मानव की अपरिपक्वता को मान्यता देता है। उदाहरण के लिए, 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को पूरी तरह उत्तरदायी नहीं ठहराया जाता। जब इंसान की अपूर्णता को कानून मान्यता देता है तो बिना किसी कानूनी चेतना वाले जानवरों से हम परिपूर्ण आचरण की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? कुत्तों के साथ क्रूरता को अक्सर सामान्य मान लिया जाता है। उन्हें मारना-पीटना या तंग करना कभी-कभी “खेल” कहकर टाल दिया जाता है। लेकिन जब वही कुत्ता अपनी रक्षा करता है तो उसे “आक्रामक” घोषित कर दिया जाता है। असल जिम्मेदारी इंसानों की है—उन कमजोर प्राणियों के प्रति, जिन्हें हमने ही असुरक्षित बना दिया है। इंसानी लापरवाही—त्यागे गए पालतू, गंदगी और खराब अपशिष्ट प्रबंधन—का दंड जानवरों को देना अन्यायपूर्ण और अमानवीय है।
सुरक्षा का भ्रमपूर्ण तर्क
सुप्रीम कोर्ट ने कहा—“पशु अधिकार कार्यकर्ता उन लोगों को वापस नहीं ला सकते जो रेबीज़ से मर गए।” यह तर्क कई अन्य मौतों से तुलना में असंगत है। कैंसर, सड़क दुर्घटनाएं, प्रदूषण और कोविड-19 ने लाखों जानें लीं, लेकिन इनके लिए हम जागरूकता, नियम और उपचार का सहारा लेते हैं—न कि बड़े पैमाने पर संहार का। भारत में हर साल लगभग 18,000–20,000 लोग रेबीज़ से मरते हैं। यह बीमारी टीकाकरण और नसबंदी से पूरी तरह रोकी जा सकती है। ऐसे में कुत्तों का बड़े पैमाने पर हटाया जाना अनावश्यक और नैतिक रूप से सवालों के घेरे में है।
करुणा पर आधारित वैश्विक समाधान
विश्व अनुभव मानवीय प्रबंधन को सबसे प्रभावी मानता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO): “कुत्तों की हत्या से रेबीज़ कम नहीं होता, केवल निरंतर टीकाकरण ही समाधान है।”
भूटान ने लगभग सभी कुत्तों की नसबंदी कर रेबीज़ पर नियंत्रण पाया।
श्रीलंका ने टीकाकरण और नसबंदी से रेबीज़ मौतों को 90% तक घटा दिया।
तुर्की में कुत्तों को टीका, भोजन और आश्रय मिलता है, और क्रूरता पर कड़ी रोक है।
काठमांडू, नेपाल में नसबंद और टीका लगे कुत्तों को वापस सड़कों पर छोड़ा जाता है।
पुर्तगाल और रोमानिया में भी Trap-Neuter-Return अपनाया गया है।
यह साफ दर्शाता है कि रोकथाम और करुणा पर आधारित उपाय, बंदीकरण और हटाने से कहीं अधिक प्रभावी हैं।
सहअस्तित्व, न कि कैद
सुरक्षा और करुणा परस्पर विरोधी नहीं हैं। मानवीय उपाय—टीकाकरण, नसबंदी, जागरूकता और पशु-क्रूरता कानून का पालन—दोनों की रक्षा करते हैं। कुत्तों को हटाने से “वैक्यूम इफेक्ट” पैदा होता है, यानी हटाए गए कुत्तों की जगह तुरंत दूसरे आ जाते हैं। समस्या जस की तस बनी रहती है और इंसान की गैर-जिम्मेदारी को और बढ़ावा मिलता है। समुदाय स्वयं भी बदलाव ला सकते हैं। घरों के पास पानी-खाना रखना कुत्तों को भूखा नहीं रहने देता, विश्वास पैदा करता है और सुरक्षा बढ़ाता है। यहां तक कि रतन टाटा जैसे बड़े कारोबारी के होटलों में भी आवारा कुत्तों को जगह दी जाती है—यह मालिकाना हक़ नहीं बल्कि सहअस्तित्व है।
मानवता के लिए नैतिक चुनाव
हजारों साल से कुत्ते इंसानों के साथ रहे हैं—साथी, रक्षक और मददगार बनकर। वे सड़कों पर इसलिए हैं क्योंकि इंसान ने उन्हें वहां छोड़ा है। छोटी-सी दया पर वे विश्वास और वफादारी से जवाब देते हैं। उन्हें इंसानी गलतियों की सज़ा देना निर्दोषों को अपराधी बनाने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला, भले ही सुरक्षा के नाम पर हो, लेकिन दोनों प्रजातियों को असफल करता है। इंसानों को महानता का परिचय दबदबे से नहीं, बल्कि सहअस्तित्व से देना होगा। विज्ञान और वैश्विक अनुभव साबित करते हैं कि टीकाकरण, नसबंदी, जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी ही सही रास्ता है।
हमारी मानवता की परिभाषा
यह मुद्दा सिर्फ दिल्ली या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी मानवता से जुड़ा है। हमारे कदम यह तय करेंगे कि हम निःशब्द जीवों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। दिखावटी सुरक्षा के नाम पर क्रूरता चुनना नैतिक पतन है; करुणा अपनाना नैतिक प्रगति। समाज का मूल्यांकन इस बात से होता है कि वह कमजोर और असहायों के साथ कैसा व्यवहार करता है। कुत्तों को कैद या हटाना समाधान नहीं है—यह करुणा और विज्ञान दोनों की अवहेलना है। असली समाधान मानवीय दृष्टिकोण है, जो सुरक्षा भी देता है और संवेदनशीलता भी। प्रश्न सीधा है: क्या इंसान प्रभुत्व का चक्र जारी रखेगा, या सहअस्तित्व और जिम्मेदारी चुनेगा? यही तय करेगा कि हम इंसानों और जानवरों दोनों के लिए कैसा भविष्य छोड़ते हैं।
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