साहब ! लिख देने भर से कुत्ते बाहर नहीं जाते, उन्हें हटाना पड़ता है, कागजी घोड़ों में उलझा बच्चों का भविष्य
नई पहल न्यूज नेटवर्क। मनेंद्रगढ़। देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) जब कोई आदेश जारी करती है, तो उसका मकसद व्यवस्था को सुधारना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। लेकिन निचले स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह है कि कोर्ट के आदेशों को केवल ‘पोस्टर’ समझकर दीवारों पर चिपका दिया जाता है, उनका पालन करना सिस्टम शायद ‘भूल’ चुका है। इसका सबसे ताजा और विचलित करने वाला उदाहरण स्वामी आत्मानंद स्कूल परिसर में देखने को मिला है। विडंबना देखिए कि स्कूल के मुख्य द्वार पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी कुत्तों के आतंक से मुक्ति का आदेश गर्व से लिखा गया है, लेकिन उसी दीवार की छाया में आवारा कुत्तों का झुंड बेखौफ घूम रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का ‘हंटर’ और राज्यों की सुस्ती
हाल ही में जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की तीन सदस्यीय बेंच ने देश भर के स्कूलों और अस्पतालों को ‘डॉग-फ्री ज़ोन’ घोषित करने का कड़ा निर्देश दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से राज्यों की ढिलाई पर नाराजगी जताते हुए तीन मुख्य बिंदुओं पर कार्रवाई का आदेश दिया था:
- नो एंट्री (सुरक्षित घेराबंदी): संस्थानों को परिसर की फेंसिंग (बाड़) ऐसी करनी है कि कुत्ता अंदर न घुस सके। स्वामी आत्मानंद स्कूल में आदेश तो लिख दिया गया, लेकिन सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम आज भी नदारद हैं।
- रिलोकेशन (पुनर्वास) का नया नियम: कोर्ट ने साफ कहा है कि नसबंदी के बाद कुत्तों को स्कूल या अस्पताल परिसर में वापस कतई न छोड़ा जाए। उन्हें शेल्टर होम भेजा जाए। मगर यहाँ नगर निगम और स्कूल प्रबंधन के बीच तालमेल की कमी बच्चों की जान पर भारी पड़ रही है।
- जवाबदेही का सवाल: कोर्ट ने संस्थान में ‘नोडल ऑफिसर’ और राज्य स्तर पर ‘मुख्य सचिव’ की जिम्मेदारी तय की है। इसके बावजूद स्कूल परिसर में कुत्तों की मौजूदगी बताती है कि जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित है।
दहशत के साये में बचपन
स्वामी आत्मानंद स्कूल जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में जहाँ सैकड़ों बच्चे अपना भविष्य गढ़ने आते हैं, वहाँ हर कदम पर कुत्तों के हमले का डर बना रहता है। गेट पर लिखा आदेश अभिभावकों को चिढ़ाता हुआ प्रतीत होता है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? क्या आदेश को दीवार पर लिख देने भर से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी?
बड़ा सवाल: ‘जी हुजूर’ से आगे कब बढ़ेगा प्रशासन ?
सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बाद भी स्थानीय प्रशासन और स्कूल प्रबंधन का यह ‘कैजुअल’ रवैया सीधे तौर पर अदालत की अवमानना है। अब देखना यह होगा कि खबर प्रकाशित होने के बाद क्या संबंधित अधिकारी कुंभकर्णी नींद से जागते हैं या फिर मासूम बच्चे इसी तरह दहशत के साये में पढ़ाई करने को मजबूर रहेंगे।







