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भारतीयता के पुरोधा : ’11 महानायक’ जो बने राष्ट्र की नियति के शिल्पकार

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पुस्तक समीक्षा: वैचारिक स्पष्टता और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का जीवंत दस्तावेज

समीक्षक: डॉ. लोकेन्द्र सिंह

(सहायक प्राध्यापक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय)

भारत का इतिहास केवल युद्धों या तारीखों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उन महान आत्माओं के तप और संघर्ष की गाथा है जिन्होंने समय-समय पर समाज को दिशा दी। सुप्रसिद्ध संचारविद् प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘11 महानायक’ (संस्मय प्रकाशन) इसी गौरवशाली शृंखला के चुनिंदा मोतियों को एक सूत्र में पिरोने का स्तुत्य प्रयास है।

एक पुस्तक: ग्यारह दृष्टिकोण, एक संकल्प ‘राष्ट्र-प्रथम’

समीक्षक डॉ. लोकेन्द्र सिंह के अनुसार, यह पुस्तक ‘गागर में सागर’ के समान है। जहाँ एक ओर इसमें छत्रपति शिवाजी महाराज के सैन्य कौशल और ‘लोकमंगल’ के शासन की चर्चा है, वहीं दूसरी ओर स्वामी विवेकानंद के उस आध्यात्मिक आह्वान का भी वर्णन है जिसने सुप्त राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया था। लेखक ने पुस्तक में विभिन्न विचारधाराओं और कार्यक्षेत्रों के नायकों को स्थान दिया है, लेकिन उन सबके भीतर प्रवाहित होने वाली ‘भारतीयता’ की अंतर्धारा को प्रमुखता से उभारा है।

​इसमें पं. मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, स्वातंत्र्यवीर सावरकर, डॉ. भीमराव अंबेडकर, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी के विचारों से भी पाठकों को अवगत कराया गया है। भारत की राजनीति में भारतीयता के विचार को स्थापित करने में श्यामाप्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी के योगदान को पुस्तक खूबसूरती से रेखांकित करती है।

भ्रमों का निवारण: सावरकर और भगत सिंह का अटूट सम्मान

पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पहलू ऐतिहासिक तथ्यों की स्पष्टता है। लेखक ने उन संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों को आईना दिखाया है जो सावरकर के योगदान पर प्रश्न उठाते हैं। पुस्तक साक्ष्य देती है कि शहीद भगत सिंह ने स्वयं ‘मतवाला’ में सावरकर को न केवल ‘वीर’ बल्कि ‘पूजनीय’ कहकर संबोधित किया था। उन्होंने उन लोगों को लताड़ा भी था जो सावरकर पर छींटाकशी करते थे।

पत्रकारिता और सामाजिक न्याय के प्रहरी

प्रो. द्विवेदी ने इस कृति में दो विशिष्ट आयामों को प्रमुखता दी है। पहला, बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का वह स्वरूप जहाँ वे पत्रकारिता के माध्यम से ‘मूक समाज’ की मुखर आवाज बने। दूसरा, पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की दूरदृष्टि, जिन्होंने 1927 में ही ‘पत्रकारिता विद्यापीठ’ की आवश्यकता महसूस की थी, जिसे आज मध्य प्रदेश सरकार ने विश्वविद्यालय के रूप में साकार किया है।

युवाओं के लिए प्रेरणा का सेतु

आज के समय में, जब युवा पीढ़ी अपने इतिहास और आदर्शों से दूर होती जा रही है, यह पुस्तक एक सेतु का काम करती है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के जीवन प्रसंगों के माध्यम से युवाओं को लक्ष्य के प्रति निरंतर प्रयास करने की प्रेरणा मिलती है।

​प्रो. संजय द्विवेदी, जो आईआईएमसी के महानिदेशक रह चुके हैं, उनकी पृष्ठभूमि इस पुस्तक की सहज और प्रवाहपूर्ण भाषा-शैली में स्पष्ट झलकती है। ऐतिहासिक तथ्यों को बिना किसी बोझिलता के प्रस्तुत किया गया है। कुल मिलाकर, ‘11 महानायक’ एक ऐसी पुस्तक है जिसे हर भारतीय को पढ़ना चाहिए।

पुस्तक विवरण:

  • पुस्तक: 11 महानायक
  • लेखक: प्रो. संजय द्विवेदी
  • प्रकाशक: संस्मय प्रकाशन, दिल्ली
  • मूल्य: 80 रुपये
  • पृष्ठ: 72

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