वीडियो : सरगुजा ओलंपिक में ‘मौत की सवारी’: पिकअप में भेड़-बकरियों की तरह ठूंसे गए मासूम खिलाड़ी, प्रशासन को क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार?

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मुख्यमंत्री के गृह संभाग में सुरक्षा के साथ भद्दा मजाक, जनकपुर के इंद्रप्रस्थ स्टेडियम में शिक्षा विभाग की संवेदनहीनता उजागर, दांव पर बच्चों की जान !

नई पहल न्यूज नेटवर्क। जनकपुर। एक ओर जहाँ ‘बस्तर ओलंपिक’ की भव्यता और बेहतर प्रबंधन की गूँज पूरे देश में सुनाई दे रही है, वहीं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गृह संभाग सरगुजा में ‘सरगुजा ओलंपिक’ बदहाली और प्रशासनिक विफलता की कहानी बयां कर रहा है। मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के भरतपुर विकासखंड में आयोजित इस प्रतियोगिता में ग्रामीण अंचलों से आए नन्हें खिलाड़ियों की सुरक्षा को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया है।

पिकअप बनी ‘खिलाड़ियों का रथ’: आखिर जिम्मेदार कौन ?

​विकासखंड स्तरीय इस दो दिवसीय खेल प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए दूर-दराज के गांवों से बच्चों को पिकअप जैसे मालवाहक वाहनों में असुरक्षित तरीके से भरकर जनकपुर मुख्यालय लाया जा रहा है। तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि कैसे इंद्रप्रस्थ स्टेडियम तक पहुँचने के लिए इन मासूमों को ठूंस-ठूंस कर भरा गया है।

  • ​नियमों की धज्जियाँ: मालवाहक वाहनों में सवारी बैठाना कानूनी रूप से अपराध है, लेकिन यहाँ शिक्षा विभाग की देखरेख में खुलेआम बच्चों की जान जोखिम में डाली जा रही है।
  • ​अधिकारियों की चुप्पी: हैरत की बात यह है कि शिक्षा विभाग के आला अधिकारी अपनी आँखों के सामने बच्चों को इन असुरक्षित वाहनों में आते-जाते देख रहे हैं, फिर भी मौन साधे हुए हैं।

बस्तर से ‘तारीफ’, सरगुजा में ‘खामियां’: दोहरा मापदंड क्यों ?

​छत्तीसगढ़ सरकार खेलों को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। बस्तर ओलंपिक ने राज्य को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई, लेकिन सरगुजा ओलंपिक में बच्चों को पिकअप में ढोना प्रशासन की गंभीरता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय इसी संभाग के जशपुर जिले से आते हैं, ऐसे में उनके ही गृह संभाग में बच्चों की सुरक्षा के साथ ऐसा खिलवाड़ सरकार की छवि को धूमिल कर रहा है।

विफलता के मुख्य बिंदु:

  1. ​परिवहन व्यवस्था शून्य: दूरस्थ क्षेत्रों से आने वाले बच्चों के लिए बसों या सुरक्षित वाहनों का प्रबंध क्यों नहीं किया गया?
  2. ​शिक्षा विभाग की लापरवाही: क्या विभाग के पास बच्चों के सुरक्षित परिवहन के लिए फंड नहीं है, या उसे लापरवाही की भेंट चढ़ा दिया गया?
  3. प्रशासनिक चूक: शिक्षा विभाग के अफसरों की नाक के नीचे बच्चों की जान के साथ यह ‘ओलंपिक’ खेल कब तक चलेगा?

जनता का सवाल : “हादसा हुआ तो कौन लेगा जिम्मेदारी ?”

ग्रामीणों और अभिभावकों में इस अव्यवस्था को लेकर भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि रास्ते में कोई अनहोनी हो गई, तो क्या शिक्षा विभाग के अधिकारी इसकी जिम्मेदारी लेंगे ? खेल प्रतिभा निखारने के नाम पर बच्चों को ‘मौत की सवारी’ कराना किसी अपराध से कम नहीं है।

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