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एक्सक्लूसिव रिपोर्ट : महिला सांसदों की भागीदारी में टीएमसी का ‘ममता मॉडल’ सुपरहिट, बड़े-बड़े राष्ट्रीय दल हुए फेल

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नारी शक्ति वंदन बिल की बहस के बीच आंकड़ों ने मचाई खलबली, महिला सशक्तिकरण में ‘दीदी’ की पार्टी निकली सबसे आगे

नई पहल न्यूज डेस्क। नई दिल्ली। देश में इस वक्त ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है। संसद से लेकर सड़क तक महिला आरक्षण की चर्चा है, लेकिन इस शोर-शराबे के बीच जो असली आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने बड़े-बड़े राजनीतिक सूरमाओं को आईना दिखा दिया है। आंकड़ों के विश्लेषण से साफ है कि महिला सांसदों को सदन भेजने के मामले में पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने देश के सभी प्रमुख दलों को पछाड़कर ‘नंबर 1’ का स्थान हासिल कर लिया है।

टीएमसी का डंका: नारों से नहीं, आंकड़ों से दी मात

आधिकारिक आंकड़ों पर गौर करें तो टीएमसी की महिला भागीदारी का ग्राफ सबसे ऊंचा है। जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियाँ प्रतिशत के मामले में काफी पीछे छूट गई हैं, वहीं टीएमसी ने एक मिसाल पेश की है:

  • TMC का दबदबा: टीएमसी के पास कुल 29 सांसद हैं, जिनमें से 11 महिला सांसद हैं। यानी टीएमसी में महिलाओं की हिस्सेदारी 37.90% है।
  • पिछड़ी बड़ी पार्टियाँ: देश की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी में महिला सांसदों का प्रतिशत महज 12.90% है, जबकि कांग्रेस में यह आंकड़ा 14.30% पर टिका है।
  • अन्य दलों का हाल: समाजवादी पार्टी (13.50%) और डीएमके (13.60%) भी टीएमसी के मुकाबले आधे पायदान पर ही खड़ी नजर आती हैं।

संसद में वोटिंग और नारी शक्ति वंदन का पेच

हाल ही में संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर जमकर वोटिंग हुई और तीखी बहस भी छिड़ी। सरकार ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया, लेकिन विपक्ष ने इसमें ओबीसी कोटे और देरी को लेकर सवाल उठाए। यह बिल सालों से भारतीय राजनीति का एक ऐसा पहेली बना हुआ है जो सुलझने का नाम नहीं ले रहा। 1996 में देवेगौड़ा सरकार के समय से लेकर आज तक, यह बिल संसद की फाइलों और विरोध के हंगामों के बीच झूलता रहा है।

इतिहास और वर्तमान का कड़वा सच

इतिहास गवाह है कि महिला आरक्षण बिल 2010 में राज्यसभा से पास होने के बावजूद लोकसभा की दहलीज पार नहीं कर सका था। आज जब दोबारा इस पर मुहर लगाने की तैयारी है, तब टीएमसी के आंकड़े यह सवाल पूछते हैं कि आखिर अन्य दल बिना किसी कानूनी मजबूरी के महिलाओं को टिकट देने में कंजूसी क्यों करते हैं?

क्या बदलेगी तस्वीर ?

संसद के भीतर का यह जेंडर गैप साफ करता है कि जब तक राजनीतिक दल अपनी इच्छाशक्ति नहीं बढ़ाएंगे, तब तक नारी शक्ति का वंदन केवल कागजों तक सीमित रहेगा। फिलहाल, टीएमसी ने अपने 37.90% के आंकड़े के साथ यह साबित कर दिया है कि वह महिला सशक्तिकरण की असल चैंपियन है।

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