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वीडियो : खोंगापानी की गलियों में ‘सूरज’ की तपिश : ये दारी, सूरज भैया की बारी” के साथ विरासत ने भरी हुंकार

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डॉ. महंत के ‘पॉलिटिकल वारिस’ के लिए बिछने लगी बिसात; कल की ‘तस्वीर’ और आज के ‘नारे’ दे रहे बड़े सियासी बदलाव के संकेत

खोंगापानी/मनेंद्रगढ़। छत्तीसगढ़ की सियासत में जब दिग्गज अपनी चालें चलते हैं, तो उसकी गूंज दूर तक सुनाई देती है। अविभाजित कोरिया जिले के दो दिवसीय प्रवास पर आए नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत के साथ उनके पुत्र सूरज महंत की मौजूदगी ने खोंगापानी की धरती पर एक नई राजनीतिक चेतना को जन्म दे दिया है। नगर पंचायत अध्यक्ष ललिता रामा यादव के निवास पर उमड़ा जनसैलाब और वहां लगे नारों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महंत परिवार की तीसरी पीढ़ी अब केवल पर्दे के पीछे नहीं, बल्कि ‘फ्रंट फुट’ पर खेलने के लिए तैयार है।

दहाड़ उठा युवा जोश: “ये दारी, सूरज भैया की बारी!”

कार्यक्रम का सबसे चर्चित हिस्सा वह वीडियो रहा, जिसमें एनएसयूआई जिलाध्यक्ष कासिम अंसारी के नेतृत्व में युवाओं ने पूरे जोश के साथ नारा बुलंद किया— “ये दारी, सूरज भैया की बारी!”। यह महज एक नारा नहीं, बल्कि उन हजारों कार्यकर्ताओं की दबी हुई आवाज है जो लंबे समय से सूरज महंत को नेतृत्व करते देखना चाहते थे। कल ही स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल के साथ सूरज की हाथ मिलाती तस्वीर ने ‘शिष्टाचार’ की चर्चा छेड़ी थी, लेकिन आज के नारों ने इसे ‘राजनीतिक रणभेरी’ में बदल दिया है।

कौन हैं सूरज महंत ? उच्च शिक्षा और गहरी जमीनी पकड़

​सूरज महंत छत्तीसगढ़ की राजनीति के उस घराने से आते हैं जिसने दशकों तक प्रदेश और केंद्र की राजनीति को दिशा दी है।

  • वैश्विक विजन: अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिसौरी-कंसास सिटी (UMKC) से शिक्षा प्राप्त सूरज के पास आधुनिक प्रशासन और जननीति का वैश्विक नजरिया है।
  • विरासत और जिम्मेदारी: अपने पिता के विधानसभा क्षेत्र सक्ति और माता ज्योत्सना महंत के संसदीय क्षेत्र कोरबा में सूरज पहले से ही ‘संकटमोचक’ की भूमिका निभा रहे हैं। वे केवल एक नेता के पुत्र नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के बीच ‘सुलभ’ रहने वाले एक कर्मठ साथी के रूप में पहचाने जाते हैं।

क्या विधानसभा की दहलीज या लोकसभा की सीढ़ी ?

​महंत परिवार की तीसरी पीढ़ी का यह पदार्पण अब कई कयासों को जन्म दे रहा है। डॉ. महंत भले ही यह कहें कि “सूरज अभी काम सीख रहा है,” लेकिन खोंगापानी की जनता ने अपना फैसला सुना दिया है। सूरज खुद को ‘कांग्रेस का सिपाही’ बताते हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली और कार्यकर्ताओं के प्रति समर्पण उन्हें एक बड़े नेतृत्व की श्रेणी में खड़ा करता है।

विरासत का नया ‘उदय’

​विरासत की सियासत में ‘सूरज’ का यह उदय विरोधियों के लिए चुनौती और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए संजीवनी साबित हो सकता है। जिस तरह से सूरज ने आम जन की समस्याओं के निदान में खुद को झोंका है, वह उनके भविष्य की एक सुनहरी तस्वीर पेश करता है। अब देखना यह है कि “ये दारी” यानी इस बार का अवसर सूरज को किस सदन तक लेकर जाता है।

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