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विशेष रिपोर्ट : लाशों पर खड़ी औद्योगिक तरक्की, आखिर कब तक ‘सस्ता’ रहेगा मजदूरों का खून ?

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सक्ती के पावर प्लांट में मची चीख-पुकार : 16 मौतें, 30 घायल, क्या बालको कांड की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा न्याय ?

रायपुर/सक्ती। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक गलियारों से एक बार फिर चीखें सुनाई दे रही हैं, और इन चीखों में वही पुराना सवाल गूंज रहा है— “क्या मजदूर की जान की कोई कीमत नहीं?” मंगलवार दोपहर सक्ती जिले के डभरा (सिंघीतराई) स्थित ‘वेदांता लिमिटेड’ के पावर प्लांट में हुए भीषण बॉयलर ब्लास्ट ने न केवल 16 घरों के चिराग बुझा दिए, बल्कि राज्य के औद्योगिक सुरक्षा दावों की कलई भी खोल कर रख दी है।

मौत का तांडव : दोपहर 2 बजे फटा ‘काल’ का बॉयलर

​मंगलवार का दिन डभरा क्षेत्र के लिए किसी भयावह सपने जैसा रहा। दोपहर करीब 2 बजे, जब प्लांट में सामान्य कामकाज चल रहा था, अचानक एक जोरदार धमाके ने पूरी धरती को हिला दिया। प्लांट का बॉयलर फटने से गर्म राख और लोहे के टुकड़े काल बनकर मजदूरों पर गिरे।

  • मौतों का आंकड़ा: अब तक 16 मजदूरों की मौत की पुष्टि हो चुकी है।
  • घायलों की स्थिति: 30 से अधिक मजदूर झुलसी हुई अवस्था में अस्पतालों में भर्ती हैं, जिनमें से कई की हालत अत्यंत नाजुक है।
  • ग्राउंड जीरो: घटना के बाद प्लांट परिसर में अफरा-तफरी का माहौल था। प्रशासन और दमकल की टीमें जब तक पहुँचतीं, तब तक कई मजदूर मलबे और आग की चपेट में आ चुके थे।

15 साल बाद भी ‘बालको’ के जख्म हरे : न्याय की सुस्त चाल

​सक्ती की इस त्रासदी ने 2009 के उस काले दिन की याद दिला दी है, जब कोरबा के बालको (BALCO) में निर्माणाधीन चिमनी गिरने से 40 से ज्यादा मजदूर दबकर मर गए थे।

विफलता का इतिहास: बालको हादसे के मुख्य आरोपी (सेपको के इंजीनियर) आज भी देश से बाहर हैं। 15 साल के लंबे इंतजार के बाद 2025 में कोर्ट ने सख्ती तो दिखाई, लेकिन आज तक किसी को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जा सका है।

​यही वह कड़वा सच है जो सक्ती हादसे के पीड़ितों को डरा रहा है। क्या वेदांता का यह मामला भी दशकों तक कानूनी दांव-पेचों में उलझा रहेगा?

सुरक्षा मानकों की बलि या प्रशासनिक साठगांठ ?

​औद्योगिक विशेषज्ञों और प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि प्लांटों में उत्पादन बढ़ाने के दबाव में सुरक्षा मानकों (Safety Norms) को ताक पर रख दिया जाता है।

  1. निगरानी का अभाव: श्रम विभाग और औद्योगिक सुरक्षा विभाग की टीमें केवल कागजों पर निरीक्षण करती हैं।
  2. जवाबदेही शून्य: हादसे के बाद जांच कमेटियां बनती हैं, मुआवजे का ऐलान होता है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों पर कभी ‘गैर-इरादतन हत्या’ का फंदा नहीं कसता।
  3. आउटसोर्सिंग का खेल: अधिकांश मजदूर ठेका पद्धति पर होते हैं, जिससे कंपनियां बड़ी आसानी से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती हैं।

बड़ा सवाल: क्या इस बार बदलेगी तस्वीर ?

​मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन ने जांच के आदेश दे दिए हैं, लेकिन जनता के मन में गहरे संशय हैं।

  • ​क्या सेपको और वेदांता जैसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों की जवाबदेही तय होगी?
  • ​क्या उन 16 परिवारों को न्याय मिलेगा जिन्होंने अपने कमाऊ सदस्य खो दिए?
  • ​या फिर, कुछ लाख रुपयों के मुआवजे के साथ इस खूनी खेल पर पर्दा डाल दिया जाएगा?

छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इतिहास में सक्ती का यह हादसा एक और काला अध्याय है। यदि इस बार भी न्याय मिलने में 15 साल लगे, तो यह मान लेना चाहिए कि व्यवस्था के पास मजदूरों की सुरक्षा के लिए कोई विजन नहीं है, केवल शोक संवेदनाओं का ढोंग है।

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