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महा-घोटाला : एक जमीन, दो जिलों के दावेदार… क्या सरकारी कलम से हुआ 23 एकड़ का ‘सौदा’ ?

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महासमुंद के शरीफाबाद में राजस्व रिकॉर्ड का ‘खूनी खेल’, पुश्तैनी जमीनों पर भू-माफिया की गिद्ध दृष्टि !

नई पहल न्यूज नेटवर्क। महासमुंद। क्या कोई जमीन एक साथ दो अलग-अलग जिलों के लोगों की हो सकती है? क्या सरकारी दस्तावेज इतने कमजोर हैं कि उन्हें रसूख के दम पर रातों-रात बदला जा सकता है? महासमुंद के पिथौरा तहसील से सामने आई ‘जमीन की दोहरी रजिस्ट्री’ की यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, लेकिन इसके पीछे असली खून-पसीना उन 8 गरीब किसानों का है, जिनकी पैरों के नीचे से उनकी जमीन खिसकाने की बड़ी साजिश रची गई है।

डिजिटल युग में ‘एनालॉग’ भ्रष्टाचार ?

​शरीफाबाद के पटवारी हल्का नंबर 44 में राजस्व विभाग के जादुई खेल ने सबको हैरान कर दिया है। यहाँ के 8 किसान, जिनके पास 1978-79 के आवंटन पत्र और 1990-91 के मालिकाना हक के दस्तावेज मौजूद हैं, आज अपनी ही जमीन पर ‘अतिक्रामक’ घोषित किए जा रहे हैं।

खेल की बारीकियां समझिए:

  • दस्तावेजों में सेंध: एक तरफ शरीफाबाद के किसान हैं, तो दूसरी तरफ बलौदाबाजार जिले के सोनपुर के रसूखदार।
  • दोहरी सत्ता: एक ही खसरा नंबर पर दो जिलों के किसानों का नाम चढ़ जाना मानवीय भूल नहीं, बल्कि प्रशासनिक डकैती की ओर इशारा करता है।
  • फर्जीवाड़े की पराकाष्ठा: विवाद के बावजूद जनवरी 2026 में इस जमीन का सौदा (विक्रय) भी कर दिया गया। सवाल यह है कि जब मामला विवादित था, तो रजिस्ट्री कैसे हुई?

“मिट्टी हमारी है, पर कागजों में ‘कब्जा’ किसी और का”

​किसान तेजकुमार वैष्णव और परमानंद पटेल के चेहरे पर हताशा और आक्रोश साफ दिखता है। वे कहते हैं, “हमारे दादा-परदादाओं ने इस बंजर को सोना बनाया। आज जब जमीन की कीमत करोड़ों में हुई, तो भू-माफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों की नजर हमारे हल पर पड़ गई। हमें अपनी ही जमीन से बेदखल करने के लिए डराया जा रहा है।”

​यह सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उन 8 परिवारों की रोजी-रोटी और पहचान का मामला है, जिसे रसूखदार अपने प्रभाव के दम पर निगलना चाहते हैं।

बड़ा सवाल: पटवारी के पास ‘सच’, रिकॉर्ड में ‘झूठ’ ?

​हल्का पटवारी राजेंद्र डोंगरे का बयान इस पूरे मामले की सबसे बड़ी कड़ी है। उन्होंने स्वीकार किया है कि उनके पास उपलब्ध रिकॉर्ड में जमीन शरीफाबाद के किसानों के नाम दर्ज है। अगर रिकॉर्ड सही है, तो फिर बलौदाबाजार के किसानों का दावा किस ‘अदृश्य’ दस्तावेज पर टिका है?

क्या तत्कालीन अधिकारियों ने मोटी रकम के बदले बलौदाबाजार के किसानों को चोर दरवाजे से एंट्री दी?

कलेक्टर की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का इंतजार

​मामले की गूँज अब कलेक्ट्रेट तक पहुँच चुकी है। कलेक्टर विनय कुमार लंगेह ने मामले की नब्ज पकड़ते हुए डिप्टी कलेक्टर तेजपाल सिंह के नेतृत्व में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) तैनात कर दी है। किसानों को उम्मीद है कि यह जांच सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उन चेहरों को बेनकाब करेगी जिन्होंने दफ्तरों में बैठकर ‘जमीन का शिकार’ किया है।

“जांच शुरू हो चुकी है। रिकॉर्ड की बारीकी से तुलना की जा रही है। दोषी कोई भी हो, बख्शा नहीं जाएगा।”

विनय कुमार लंगेह, कलेक्टर

सिस्टम की साख दांव पर

​यह मामला छत्तीसगढ़ के राजस्व विभाग की साख पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। अगर 50 साल पुराने रिकॉर्ड सुरक्षित नहीं हैं, तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? शरीफाबाद के ये किसान आज सिर्फ अपनी जमीन के लिए नहीं, बल्कि अपनी गरिमा और न्याय के लिए लड़ रहे हैं।

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