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वीडियो : मां ज्योत्सना महंत के लोकसभा क्षेत्र की धरती से बेटे सूरज महंत की हुंकार : “संविधान पर आंच आई तो चुप नहीं रहेगा कोरबा”, बाबा साहेब की जयंती पर जोश भरा संबोधन

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नई पहल न्यूज नेटवर्क। दीपका/कोरबा। कोरबा लोकसभा क्षेत्र के औद्योगिक केंद्र दीपका में डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में उस वक्त जोश दोगुना हो गया, जब युवा नेता सूरज महंत मंच पर आए। अपने पूरे 3 मिनट 46 सेकंड के उद्बोधन में महंत ने न केवल बाबा साहेब के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट की, बल्कि वर्तमान राजनीति की नब्ज पर हाथ रखते हुए विरोधियों को भी कड़ा संदेश दिया।

“यह मात्र एक उत्सव नहीं, अधिकारों की जंग का शंखनाद है”

​मंच संभालते ही सूरज महंत ने दीपका की जनशक्ति को नमन करते हुए कहा कि अंबेडकर जयंती मनाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उन अधिकारों को दोहराने का दिन है जो हमें बाबा साहेब ने दिए हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि आज देश का संविधान एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है और कोरबा की जागरूक जनता इसे आंच नहीं आने देगी।

भाषण की 3 बड़ी और एक्सक्लूसिव बातें:

1. “संविधान है तो हम हैं”:

सूरज महंत ने वीडियो के मध्य में जोर देकर कहा कि आज देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने जनता को आगाह किया कि यदि संविधान कमजोर हुआ, तो सबसे पहले गरीब, मजदूर और शोषित वर्ग के अधिकार छीने जाएंगे।

2. श्रमिक वर्ग और बाबा साहेब का नाता:

दीपका की भौगोलिक स्थिति (कोयला खदान क्षेत्र) को देखते हुए उन्होंने कहा कि मजदूरों को जो 8 घंटे काम, छुट्टी और सम्मान मिला है, वह बाबा साहेब की ही देन है। उन्होंने श्रमिकों से अपील की कि वे अपनी ताकत को पहचानें और एकजुट रहें।

3. युवाओं को ‘कलम’ की ताकत का एहसास:

भाषण के अंतिम हिस्से में महंत ने युवाओं की ओर इशारा करते हुए कहा— “तलवारों से ज्यादा ताकत बाबा साहेब की स्याही में है।” उन्होंने शिक्षा को ही समाज के उत्थान का एकमात्र रास्ता बताया और ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ के नारे को धरातल पर उतारने की बात कही।

क्षेत्रीय राजनीति पर कटाक्ष और एकता का आह्वान

​सूरज महंत ने अपने संबोधन के दौरान बिना नाम लिए राजनीतिक विरोधियों पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जो लोग संविधान को बदलने की बात करते हैं, उन्हें दीपका और कोरबा की गलियों से करारा जवाब मिलेगा। पूरे भाषण के दौरान तालियों की गड़गड़ाहट यह बता रही थी कि महंत की बातें सीधे जनता के दिलों तक पहुंच रही हैं।

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