पूंजीपतियों के आगे घुटने टेक चुकी है सरकार, बस्तर से सरगुजा तक एकजुट होकर लड़नी होगी जल-जंगल-जमीन की जंग : दीपक बैज
नई पहल न्यूज नेटवर्क। अम्बिकापुर/उदयपुर। छत्तीसगढ़ के फेफड़े कहे जाने वाले हसदेव अरण्य और ऐतिहासिक धरोहर रामगढ़ के अस्तित्व पर मंडराते संकट को लेकर आज सरगुजा की धरती पर आक्रोश का महाविस्फोट हुआ। रामगढ़ संरक्षण एवं संवर्धन समिति द्वारा आयोजित महा-परिचर्चा में भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बावजूद राज्य के पांचों संभागों से 5 से 6 हजार ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ पड़ा। मंच से विपक्ष के दिग्गज नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सीधे तौर पर राज्य व केंद्र सरकार को कॉर्पोरेट घरानों की ‘गुलाम’ बताते हुए आर-पार की लड़ाई का शंखनाद कर दिया है।

‘एक खदान की अनुमति थी, अब 23 पर नजर’ — टीएस सिंहदेव
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने सरकार और कॉर्पोरेट साठगांठ पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा:
”केंद्र में जब कांग्रेस की सरकार थी, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की मांग पर हसदेव क्षेत्र में केवल एक कोल खदान को अनुमति दी गई थी और साफ कहा गया था कि इसके आगे नई खदानें नहीं खुल सकतीं। नियमों की एक ‘लक्ष्मण रेखा’ खींची गई थी। लेकिन केंद्र में भाजपा सरकार आते ही ‘रावण’ को घर में घुसाने के लिए उस लक्ष्मण रेखा को ही मिटा दिया गया। आज 1 के स्थान पर 23 खदानें चिन्हांकित हैं। केते एक्सटेंशन को मंजूरी के बाद अब हमारे ऐतिहासिक रामगढ़ का अस्तित्व ही खतरे में है।”
सिंहदेव ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐतिहासिक मंदिर की जगह नया भव्य मंदिर बनाने का भूमिपूजन सरकार की कुटिल चाल है। सरकार खुद मानती है कि खनन के कारण रामगढ़ की चट्टानों में दरारें आ रही हैं, इसीलिए वहां चेतावनी के बोर्ड लगाए गए हैं। उन्होंने ग्रामीणों से पूछा— “ज़मीन, जल, जंगल हमारा बर्बाद हो रहा है, तो अडानी की खदानों में नौकरियां बाहर वालों को क्यों मिल रही हैं?”


आदिवासी मुख्यमंत्री के राज में सबसे ज्यादा प्रताड़ित हैं आदिवासी : दीपक बैज
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने बस्तर और सरगुजा के संघर्ष को एक सूत्र में पिरोते हुए कहा कि जब-जब आदिवासियों की ज़मीन छीनी गई, तब-तब वीर नारायण सिंह और वीर गुंडाधूर जैसे नायक पैदा हुए। बैज ने तीखा तंज कसते हुए कहा:
”प्रदेश में आज एक आदिवासी मुख्यमंत्री (विष्णुदेव साय) बैठे हैं, लेकिन सबसे बुरी स्थिति आदिवासियों की ही है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को उकसाकर उन पर कार्रवाई की जा रही है। यह सरकार पूरी तरह अडानी-अम्बानी जैसे पूंजीपतियों की गुलाम बन चुकी है। चेहरा सरकार का है, लेकिन पीछे से रिमोट कंट्रोल उद्योगपतियों के हाथ में है।”
देश में फिर से हावी हो रहा है ‘कंपनी राज’
- मनीष शर्मा (राष्ट्रीय प्रभारी, यूथ कांग्रेस): “अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ हमारे बुजुर्गों ने एकजुट होकर लड़ाई लड़ी थी। आज फिर देश में ‘कंपनी राज’ हावी है, जिसे जल, जंगल, जमीन, एयरपोर्ट, पोर्ट और रेलवे सब कुछ चाहिए। लेकिन देश की मालिक जनता है, कोई कंपनी नहीं।”
- विनोद नागवंशी (सर्व आदिवासी समाज): “हम एक बेहद समृद्ध धरती के गरीब और बेरोजगार लोग हैं। हमारी खनिज संपदा पर कोई और तिजोरी भर रहा है और आवाज़ उठाने पर हमारे ही लोगों को जेल भेजा जा रहा है।”
- रमाकांत (छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा): “हसदेव का जंगल कटा तो केवल सरगुजा ही नहीं, बल्कि कोरबा और बिलासपुर तक भयानक जल संकट की चपेट में आ जाएंगे। यह समूचे छत्तीसगढ़ के अस्तित्व की लड़ाई है।”
आलोक शुक्ला ने कहा कि यदि यह तबाही नहीं रोकी गई, तो बांगो बांध का कैचमेंट एरिया प्रभावित होगा जिससे 4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई व्यवस्था ठप हो जाएगी।
हसदेव बचाओ मंच के आलोक शुक्ला ने मंच से चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखते हुए जनता को आगाह किया।
- केते एक्सटेंशन: इसके जरिए लगभग 5,000 एकड़ क्षेत्र में 7 लाख से अधिक बड़े पेड़ काटे जाएंगे। इसमें छोटे और कम मोटाई वाले पौधों की गिनती तो शामिल ही नहीं है।
- भकूरमा एवं तारा कोल क्षेत्र: आगे चलकर इस क्षेत्र में भी लगभग 20,000 एकड़ में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की तैयारी है।
आलोक शुक्ला ने चेतावनी दी कि यदि यह तबाही नहीं रोकी गई, तो रामगढ़ सहित कई जल स्रोत हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे। 4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होने वाली बांगो बांध की सिंचाई व्यवस्था भी पूरी तरह ठप हो जाएगी। यह अडानी और सरकार की एक बहुत बड़ी साजिश है।
आसमान में मंडराते हेलीकॉप्टरों से सहमे ग्रामीण

इस महा-परिचर्चा में शामिल उदयपुर, लखनपुर, अंबिकापुर, सीतापुर, मैनपाट और सूरजपुर से आए ग्रामीणों ने एक बड़ा डर साझा किया। ग्रामीणों ने कहा कि उनके गांवों के ऊपर लगातार हो रहे ‘हवाई सर्वे’ (हेलीकॉप्टर और हवाई जहाजों की आवाजाही) से वे खौफ में हैं। उन्हें डर है कि सरकार उनकी मर्जी के बिना चुपके से उनके गांवों को भी किसी नई खदान के लिए चिन्हांकित कर रही है।
रामगढ़ की इस परिचर्चा ने यह साफ कर दिया है कि हसदेव और सरगुजा के जंगलों को बचाने की यह लड़ाई अब किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। इसे ‘कॉर्पोरेट बनाम छत्तीसगढ़ की जनता’ का रूप देकर बस्तर से सरगुजा तक एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा करने की तैयारी पूरी हो चुकी है।
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