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कृषि विस्तार अधिकारी एकता साहू के निलंबन पर भड़का आक्रोश : एमसीबी के कृषि विस्तार अधिकारियों ने दुर्ग पहुंचकर भरी हुंकार, अब पूरे प्रदेश में थमेगा काम !

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यह कार्रवाई नहीं, कृषि अधिकारियों के आत्मसम्मान पर प्रहार है – दीपक कुमार साहू अनिश्चितकालीन आंदोलन को मिला एमसीबी का बड़ा समर्थन

नई पहल न्यूज नेटवर्क। दुर्ग/मनेंद्रगढ़। अफीम मामले में ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी एकता साहू के निलंबन का मुद्दा अब छत्तीसगढ़ की राजधानी के करीब दुर्ग से लेकर एमसीबी जिले तक सुलग उठा है। छत्तीसगढ़ कृषि स्नातक शासकीय कृषि अधिकारी संघ द्वारा दुर्ग में चलाए जा रहे अनिश्चितकालीन आंदोलन को आज उस समय बड़ी ताकत मिली, जब जिला इकाई एमसीबी ने अपनी सक्रिय सहभागिता दर्ज कराते हुए प्रशासन को दो-टूक चेतावनी दे डाली।

संसाधन नहीं, पर कार्रवाई में तेजी ?

आंदोलन स्थल पर अपने ओजस्वी उद्बोधन से जोश भरते हुए संघ के प्रांतीय कार्यालयीन सचिव एवं एमसीबी जिलाध्यक्ष दीपक कुमार साहू ने सीधे सिस्टम पर सवाल दागे। उन्होंने कहा, “मैदानी स्तर पर जूझ रहे अधिकारियों को न पर्याप्त संसाधन दिए जाते हैं, न तकनीकी मार्गदर्शन, लेकिन समस्याएं उठने पर उन्हें ही बलि का बकरा बना दिया जाता है। एकता साहू का निलंबन केवल एक व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि प्रदेश के हर उस कृषि अधिकारी के सम्मान पर आघात है जो विपरीत परिस्थितियों में काम कर रहा है।”

एमसीबी की ओर से ‘नैतिक और आर्थिक’ संजीवनी

​आंदोलन को धार देने के लिए जिला एमसीबी की ओर से न केवल समर्थन दिया गया, बल्कि आंदोलन के संचालन हेतु सहयोग राशि भी प्रदान की गई। दीपक साहू ने स्पष्ट किया कि यदि प्रशासन ने जल्द ही निलंबन वापस नहीं लिया, तो यह चिंगारी पूरे प्रांत में फैलेगी और समस्त कृषि विस्तार अधिकारी अनिश्चितकालीन आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

क्या है मुख्य मांगें ?

​कृषि अधिकारी संघ ने एक स्वर में मांग की है कि:

  1. एकता साहू का निलंबन तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए।
  2. ​फील्ड स्टाफ की कार्य परिस्थितियों में सुधार हेतु ठोस नीति बनाई जाए।
  3. ​बिना जांच और बिना संसाधन उपलब्ध कराए की गई एकतरफा दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगे।

​अफीम की खेती जैसे संवेदनशील मामले में एक निचले स्तर के अधिकारी पर गाज गिरना, अब एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है। जिस तरह से छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से समर्थन मिल रहा है, उससे साफ है कि यदि सरकार ने जल्द बीच का रास्ता नहीं निकाला, तो कृषि विभाग का कामकाज पूरी तरह ठप हो सकता है।

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