साहित्यिक रिश्तों की ‘प्रत्याघात’: जब पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पास पहुँची ब्रह्मवीर सिंह की नई कृति

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राजनीति की भागदौड़ के बीच ‘कलम’ का सम्मान, लेखक ब्रह्मवीर सिंह ने भेंट की अपने चर्चित उपन्यास की प्रति

नई पहल न्यूज नेटवर्क। रायपुर। पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले ब्रह्मवीर सिंह (समन्वय संपादक, हरिभूमि-INH) और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बीच का आत्मीय रिश्ता एक बार फिर चर्चा में है। अवसर था ब्रह्मवीर सिंह के नए उपन्यास ‘प्रत्याघात’ की प्रति भेंट करने का, जिसने राजनीति के गलियारों में साहित्य की एक नई गूँज पैदा कर दी है।

चुनावी शोर में भी नहीं भूली वो ‘आत्मीयता’

​स्मरण रहे कि ब्रह्मवीर सिंह के बहुचर्चित उपन्यास ‘बुत मरते नहीं’ का विमोचन तब हुआ था जब श्री बघेल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन थे और प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां अपने चरम पर थीं। उस समय की व्यस्तताओं के बावजूद, उन्होंने न केवल कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई थी, बल्कि घंटों रुककर लेखक के प्रति अपना स्नेह और सम्मान प्रदर्शित किया था। उसी आदर भाव को निरंतर रखते हुए, ब्रह्मवीर सिंह ने अब विश्व पुस्तक मेला दिल्ली में विमोचित अपने नए उपन्यास ‘प्रत्याघात’ (जो ‘बुत मरते नहीं’ का ही अगला भाग है) की पहली प्रतियों में से एक श्री बघेल को सौंपी।

सादगी भरा मिलन: शुभकामनाओं के साथ साझा हुई यादें

​मुलाकात के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री अपने उसी सहज और आत्मीय अंदाज में दिखे, जिसके लिए वे जाने जाते हैं। उन्होंने ‘प्रत्याघात’ के लिए लेखक को अपनी शुभकामनाएं दीं और उनके सृजन कर्म की सराहना की। इस मौके पर पत्रकारिता और सामाजिक क्षेत्र के कई दिग्गजों की मौजूदगी ने वातावरण को और भी गरिमामय बना दिया।

​इस गरिमामय अवसर के साक्षी बने:

  • ​धनंजय वर्मा: वरिष्ठ साथी एवं स्थानीय संपादक, हरिभूमि (रायपुर)
  • आर.पी. सिंह: वरिष्ठ शुभचिंतक
  • विनोद तिवारी: आत्मीय मित्र

मेरे लिए यह केवल एक पुस्तक भेंट करना नहीं, बल्कि उस सम्मान के प्रति आभार व्यक्त करना था जो श्री बघेल ने मेरी पिछली कृति के समय दिया था। उनकी सहजता आज भी वैसी ही प्रेरणादायी है।

— ब्रह्मवीर सिंह, लेखक एवं समन्वय संपादक

क्यों खास है ‘प्रत्याघात’ ?

​‘बुत मरते नहीं’ की अपार सफलता के बाद पाठक इसके अगले हिस्से का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में धूम मचाने के बाद अब यह उपन्यास प्रदेश के प्रबुद्ध जनों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। राजनीति, समाज और मानवीय संवेदनाओं को पिरोने वाली ब्रह्मवीर सिंह की यह कलम अब पाठकों के हाथों में है।

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