31 मार्च 2026 की तारीख बस्तर के इतिहास में केवल एक ‘डेडलाइन’ नहीं, बल्कि एक नए युग का उदय बनकर दर्ज हुई है। कभी ‘रेड कॉरिडोर’ के नाम से डराने वाला बस्तर आज देश की मुख्यधारा से कदमताल कर रहा है। छत्तीसगढ़ के वित्त मंत्री और दंतेवाड़ा के पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी का यह विशेष लेख बस्तर के उस दर्दनाक अतीत और इस ऐतिहासिक परिवर्तन की गौरवगाथा को बयां करता है, जो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ‘दृढ़ संकल्प’ और राज्य की ‘विष्णुदेव साय सरकार’ की सक्रियता से संभव हुआ है।
अतीत का वह खौफनाक मंजर: जब दंतेवाड़ा जाना चुनौती था
लेख में ओपी चौधरी अपने आईएएस कार्यकाल को याद करते हुए बताते हैं कि 1980 के दशक से लेकर 2025 तक बस्तर ने जो सहा, वह अकल्पनीय था। ताड़मेटला (2010), झीरम घाटी (2013) और अरनपुर जैसे हादसों ने बस्तर की माटी को लहूलुहान किया था। कलेक्टर के रूप में उन्होंने वह दौर देखा था जब सड़कों का निर्माण नामुमकिन था और नक्सलियों की ‘समानांतर सरकार’ चलती थी। तब किसी ने नहीं सोचा था कि बस्तर कभी पूरी तरह नक्सलवाद से मुक्त हो पाएगा।
शाह का संकल्प और 31 मार्च की ऐतिहासिक ‘डेडलाइन’
बस्तर के इस बदलाव की नींव अगस्त 2024 में रखी गई, जब गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट समय-सीमा तय की— “31 मार्च 2026 तक देश को नक्सल मुक्त करना है।” लेख के अनुसार, यह केवल एक सरकारी घोषणा नहीं थी, बल्कि एक बहुआयामी रणनीति थी, जिसके मुख्य स्तंभ थे:



- सुरक्षा अभियान: ‘फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस’ (FOB) बनाना और आधुनिक तकनीक (ड्रोन, खुफिया तंत्र) का इस्तेमाल।
- विकास कार्य: 100% सड़क कनेक्टिविटी और बैंकिंग-इंटरनेट सेवाओं का विस्तार।
- पुनर्वास नीति: आत्मसमर्पण करने वालों को मकान, जमीन और सम्मानजनक जीवन की गारंटी।
आंकड़ों की जुबानी: टूटती नक्सलियों की कमर
वित्त मंत्री ने लेख में चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए हैं, जो इस जीत की तस्दीक करते हैं। बस्तर रेंज में:
- 706 नक्सली ढेर किए गए।
- 2218 गिरफ्तार हुए और 4839 ने आत्मसमर्पण किया।
- अकेले 2025 में 256 नक्सली मुठभेड़ में मारे गए और भारी मात्रा में आईईडी व हथियार बरामद हुए।
गोली का जवाब सिर्फ गोली नहीं, ‘विश्वास’ से मिला
लेख का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह जीत केवल हथियारों के दम पर नहीं मिली। सरकार ने “गोली का जवाब सुरक्षा के साथ विकास” के फॉर्मूले से दिया। आज बस्तर का युवा बंदूक के बजाय एजुकेशन सिटी, कौशल केंद्रों और सरकारी नौकरियों की ओर बढ़ रहा है। बस्तर के किसान अब बिना डर के अपनी फसल बेच रहे हैं और ‘बस्तर पंडुम’ के माध्यम से यहाँ की संस्कृति वैश्विक मंच पर चमक रही है।
‘नक्सल मुक्त’ भारत का नया प्रतीक
ओपी चौधरी लिखते हैं कि यह जीत उन हजारों शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि है, जिन्होंने बस्तर को बचाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। 31 मार्च 2026 को मिली यह सफलता साबित करती है कि यदि नेतृत्व में इच्छाशक्ति हो, तो कोई भी समस्या अजेय नहीं है। बस्तर अब डर का नहीं, बल्कि आर्थिक क्रांति और शांति का नया अध्याय लिख रहा है।




