बिना टेंडर 40 लाख का भुगतान, बिना छात्रों के रख लिए अतिथि शिक्षक, दुर्ग यूनिवर्सिटी के कारनामों पर भड़के भिलाई विधायक
नई पहल न्यूज नेटवर्क। भिलाई/दुर्ग। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय (दुर्ग यूनिवर्सिटी) इन दिनों गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं के चक्रव्यूह में फंसता नजर आ रहा है। भिलाई नगर के कद्दावर विधायक देवेंद्र यादव ने सीधे विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. संजय तिवारी को कटघरे में खड़ा करते हुए उन पर करोड़ों रुपये की वित्तीय और शैक्षणिक गड़बड़ी के सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। इस पूरे मामले को लेकर विधायक ने महामहिम राज्यपाल एवं कुलाधिपति रमेन डेका को एक तीखा पत्र सौंपकर उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच और कुलपति के खिलाफ तत्काल सख्त कार्रवाई की मांग की है।
विधायक यादव का साफ कहना है कि नियमों को ताक पर रखकर लिए जा रहे इन फैसलों से न सिर्फ विश्वविद्यालय की साख धूल-धूसरित हो रही है, बल्कि हजारों छात्र-छात्राओं का भविष्य भी अंधकार में धकेला जा रहा है।
गड़बड़ियों का ‘कच्चा चिट्ठा’: टेंडर का खेल और 40 लाख की उत्तरपुस्तिकाएं
विधायक देवेंद्र यादव द्वारा राज्यपाल को सौंपे गए पत्र में विश्वविद्यालय के भीतर चल रहे कई काले कारनामों का सिलसिलेवार खुलासा किया गया है:
- नियमों को ठेंगा, निजी फर्म को फायदा: मार्च 2026 में करीब 12 लाख रुपये से अधिक की उत्तरपुस्तिकाओं (Answer Sheets) की खरीदी के लिए पहले तो सरकारी निविदा (Tender) प्रक्रिया निकाली गई। लेकिन बाद में बैकडोर एंट्री करते हुए कुलपति ने अपने विशेषाधिकार का गलत इस्तेमाल किया। एक निजी फर्म को अर्द्धशासकीय पत्र जारी कर न सिर्फ काम सौंप दिया गया, बल्कि नियमों के विपरीत 40 लाख रुपये से अधिक का भारी-भरकम भुगतान भी कर दिया गया।
- बिना टेंडर खरीदी गईं 40 लाख की किताबें: नए पाठ्यक्रमों के नाम पर करीब 40 लाख रुपये की लागत से मात्र 380 पुस्तकें खरीदी गईं। इस खरीदी के लिए न तो कोई टेंडर निकाला गया और न ही किसी वित्तीय नियम का पालन हुआ। आरोप है कि यह पूरी डील केवल ‘मौखिक निर्देशों’ पर फाइनल कर दी गई, जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है।
नियमों के खिलाफ नए कोर्स और ‘अदृश्य’ विभागों में नियुक्तियां
विश्वविद्यालय में सिर्फ पैसों का ही नहीं, बल्कि शैक्षणिक नियमों का भी जमकर मखौल उड़ाया गया है:
बिना सरकार की अनुमति के निरीक्षण: विश्वविद्यालय प्रबंधन ने MBA, MCA, PGDBM सहित 8 नए कोर्स शुरू करने के लिए AICTE और RCI से निरीक्षण तो करवा लिया, लेकिन इसके लिए राज्य शासन (सरकार) से अनिवार्य अनुमति लेना भी मुनासिब नहीं समझा। इतना ही नहीं, एक ही इंफ्रास्ट्रक्चर (विभागीय संरचना) को बार-बार बदलकर अलग-अलग कोर्स की मान्यता लेने का फर्जीवाड़ा भी किया गया।
- न छात्र आए, न विभाग बना, पहले ही रख लिए टीचर: शैक्षणिक सत्र शुरू होने, विभागों के अस्तित्व में आने और छात्रों के प्रवेश से पहले ही, गुपचुप तरीके से 5 विषयों के लिए 15 अतिथि व्याख्याताओं (Guest Lecturers) की नियुक्ति कर दी गई। सवाल उठता है कि जब छात्र ही नहीं थे, तो ये शिक्षक किसे पढ़ा रहे थे और इन्हें सैलरी किसके इशारे पर दी जा रही थी?
परीक्षा प्रणाली से खिलवाड़: पहले किया फेल, फिर डरकर सबको कर दिया पास !
यूनिवर्सिटी की परीक्षा प्रणाली का एक और चौंकाने वाला वाकया सामने आया है। “English Legal Language” विषय की परीक्षा में करीब 400 छात्र शामिल हुए थे। प्रश्नपत्र अंग्रेजी में था, लेकिन 380 छात्रों ने उत्तर हिंदी में लिखे।
- पहला कदम: विश्वविद्यालय ने नियमों का हवाला देकर इन सभी 380 छात्रों को अनुत्तीर्ण (Fail) घोषित कर दिया।
- दूसरा कदम: जैसे ही छात्रों ने उग्र आंदोलन की चेतावनी दी, कुलपति और प्रबंधन के हाथ-पैर फूल गए। आनन-फानन में बिना किसी ठोस कानूनी आधार के पुनर्मूल्यांकन (Revaluation) का नाटक रचा गया और सभी को रातों-रात पास कर दिया गया। यह वाकया विवि की परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह संदेहास्पद बनाता है।
कार्यपरिषद को रखा अंधेरे में, अब राज्यपाल से न्याय की उम्मीद
विधायक देवेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय के अधिनियमों के तहत जिन महत्वपूर्ण वित्तीय फैसलों की मंजूरी ‘कार्यपरिषद’ (Executive Council) से ली जानी अनिवार्य थी, उन्हें जानबूझकर छिपाया गया और कार्यपरिषद को अंधेरे में रखकर मनमाने ढंग से पैसे ठिकाने लगाए गए।
विधायक की दो टूक:
”विश्वविद्यालय ज्ञान का मंदिर है, भ्रष्टाचार का अड्डा नहीं। छात्रों के हितों और इस उच्च शिक्षण संस्थान की गरिमा को बचाने के लिए एक उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच समिति का गठन बेहद जरूरी है। दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।”
अब गेंद महामहिम राज्यपाल के पाले में है। देखना होगा कि राजभवन इस मामले में कितनी जल्दी और कितनी कड़ी कार्रवाई के निर्देश जारी करता है।
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