न पद स्वीकृत, न विज्ञापन; फिर भी ‘मेहरबान’ प्रशासन ने बाँट दी कुर्सियाँ, बोर्ड परीक्षा में फिसड्डी रहा जिला
मनेन्द्रगढ़। छत्तीसगढ़ का नवगठित जिला एमसीबी इन दिनों विकास की जगह प्रशासनिक मनमानियों और विवादित पदस्थापनों को लेकर सुर्खियों में है। एक ओर जहाँ जिले की शिक्षा व्यवस्था वेंटिलेटर पर नजर आ रही है, वहीं दूसरी ओर कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के स्तर पर लिए जा रहे फैसले ‘सुशासन’ के दावों की पोल खोल रहे हैं। सूत्रों की मानें तो जिले में नियमों को दरकिनार कर चहेतों को मलाईदार पदों से नवाजा जा रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर पढ़ाई पूरी तरह ठप हो चुकी है।
रिजल्ट में ‘जीरो’, रेवड़ी बाँटने में ‘हीरो’
हाल ही में घोषित माध्यमिक शिक्षा मंडल 2026 के परीक्षा परिणामों ने जिले की प्रशासनिक अक्षमता को जगजाहिर कर दिया है।
- कक्षा 10वीं: 59.12% परिणाम के साथ जिला पूरे प्रदेश में 33वें यानी अंतिम स्थान पर रहा।
- कक्षा 12वीं: 62.40% परिणाम के साथ यहाँ भी जिला अंतिम पायदान पर दर्ज किया गया।
सवाल यह उठता है कि जब जिले का शैक्षणिक प्रदर्शन रसातल में है, तब प्रशासन का ध्यान शिक्षा सुधार से ज्यादा ‘अटैचमेंट’ और ‘नियम विरुद्ध नियुक्तियों’ पर क्यों है?
बिना पद, बिना विज्ञापन : ‘रेवड़ी’ की तरह बाँटे गए APC के पद
जिले में प्रशासनिक पारदर्शिता पर सबसे बड़ा प्रहार APC (एडिशनल प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर) की नियुक्तियों को लेकर हुआ है। जानकारी के अनुसार:
- जिले में APC का पद स्वीकृत ही नहीं है।
- इसके बावजूद बिना किसी विज्ञापन या चयन प्रक्रिया के सूर्योदय सिंह (शिक्षक LB) और कलेश्वर पैकरा (शिक्षक LB) को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई। सूत्र बताते हैं कि इन नियुक्तियों के आदेश सीधे कलेक्टर स्तर से जारी हुए हैं, जो सीधे तौर पर शासन के नियमों को चुनौती देते नजर आ रहे हैं।
राजपत्रित पदों पर ‘नॉन-गजेटेड’ का कब्जा: क्या शासन से बड़ा है जिला प्रशासन ?
जिले में व्यवस्थाएं इस कदर बेपटरी हैं कि ABEO (सहायक विकासखंड शिक्षा अधिकारी) जैसे महत्वपूर्ण राजपत्रित पदों का काम गैर-राजपत्रित कर्मचारियों से लिया जा रहा है।
- बिरेन्द्र पांडेय (मनेन्द्रगढ़), विजय पांडेय (खड़गवाँ) और अनिल पटेल (भरतपुर) जैसे नामों को लेकर चर्चा गरम है कि इन्हें स्कूलों से हटाकर कार्यालयों में उपकृत किया गया है।
- प्रोबेशन का उल्लंघन: मनेन्द्रगढ़ में प्रोबेशन (परिवीक्षा अवधि) पर कार्यरत व्याख्याता जसवंत डहरिया को BRCC जैसी बड़ी जिम्मेदारी दी गई है, जबकि नियमतः प्रोबेशन के दौरान ऐसे प्रभार नहीं दिए जा सकते।
- हद तो तब हो गई जब एक सहायक शिक्षक को स्कूल से हटाकर ‘जिला नोडल PLC’ का प्रभार थमा दिया गया।
स्कूलों में ताले, दफ्तरों में मेले: ग्रामीण छात्र राम भरोसे
प्रशासनिक गलियारों में शिक्षकों के ‘अटैचमेंट’ के इस खेल ने ग्रामीण शिक्षा की कमर तोड़ दी है। शिक्षकों को स्कूलों से हटाकर दफ्तरों की शोभा बढ़ाने में लगा दिया गया है। इसका सीधा असर आदिवासी और ग्रामीण अंचलों के छात्रों पर पड़ रहा है, जिनका भविष्य इन “मनमाने फैसलों” की भेंट चढ़ रहा है।
गंभीर सवाल: जवाबदेही किसकी ?
- क्या जिला प्रशासन के पास शासन के नियमों को बदलने का विशेषाधिकार है?
- बिना स्वीकृत पद और विज्ञापन के नियुक्तियाँ क्या वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में नहीं आतीं?
- क्या राजपत्रित अधिकारियों के दायित्वों को छोटे कर्मचारियों को सौंपना संवैधानिक रूप से वैध है?
प्रशासन की यह चुप्पी कई गहरे राज दबाए बैठी है। यदि समय रहते उच्च स्तरीय जांच नहीं हुई, तो यह मामला कोर्ट की दहलीज तक पहुंचना तय है।
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