संस्कृति विभाग के नियमों की उड़ी धज्जियां, मनेन्द्रगढ़ जिला प्रशासन के एक पत्र ने खोल दी पूरे ‘सिस्टम’ की पोल !
मनेन्द्रगढ़ । छत्तीसगढ़ शासन के खर्चे पर आयोजित ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व यात्रा’ अब एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक घालमेल के भंवर में फंस चुकी है। जिला प्रशासन मनेन्द्रगढ़ द्वारा जारी सूची और छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग की मूल गाइडलाइन के बीच का विरोधाभास चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि नियमों को किस तरह मरोड़कर रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। जब सरकारी खजाने से होने वाले आयोजनों की कमान प्रशासनिक समन्वय के बजाय किसी राजनैतिक दल के दफ्तर को सौंप दी जाए, तो पारदर्शिता का दम घुटना लाजिमी है।



सरकारी गाइडलाइन बनाम जमीनी खेल : क्या लिखा था और क्या किया गया ?
संस्कृति विभाग के सचिव द्वारा जारी आधिकारिक पत्र के बिंदु क्रमांक 2 में साफ तौर पर निर्देश थे कि यात्रा में समाज के किन ‘विशिष्ट जनों’ को प्राथमिकता देनी है। लेकिन अंतिम स्वीकृत सूची को देखें, तो नियमों के साथ किया गया क्रूर मजाक साफ नजर आता है:
- आदेश था— पद्म पुरस्कार विजेताओं को सम्मान देने का: संस्कृति विभाग ने लिखा था कि जिले के पद्मविभूषण और पद्मश्री से सम्मानित नागरिकों को वरीयता देते हुए आमंत्रित करें।
- हकीकत: पूरी सूची में किसी भी पद्म पुरस्कार विजेता का नामोनिशान तक नहीं है।
- आदेश था— राष्ट्रीय-राज्य स्तर के कलाकारों को चुनने का: जिले के सम्मानित कलाकारों, साहित्यकारों और बौद्धिक समाज को प्रतिनिधित्व देना था।
- हकीकत: कला और साहित्य के इन दिग्गजों का हक मारकर सत्ताधारी दल के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को सीट दे दी गई।
- आदेश था— ऐतिहासिक और पुरातात्विक विशेषज्ञों को ले जाने का: सोमनाथ की पावन भूमि पर जिले के प्राचीन शिवालयों की पवित्र माटी और नदियों का जल लेकर जाने के लिए धार्मिक व पुरातात्विक जानकारों को जोड़ना था।
- हकीकत: इतिहास और पुरातत्व के विशेषज्ञों को घर पर बैठाकर ‘राजनैतिक पहुंच’ रखने वाले रसूखदारों को ‘विशिष्ट जन’ की श्रेणी में फिट कर दिया गया।
कलेक्टर को करना था ‘समन्वय’, लेकिन डिप्टी कलेक्टर ने मान ली ‘पार्टी की पर्ची’

संस्कृति विभाग की गाइडलाइन में कड़े शब्दों में लिखा था कि कलेक्टर्स को जिले के प्रभारी मंत्री, माननीय लोकसभा/राज्यसभा सांसद, माननीय विधायकगण से समन्वय करते हुए 25 विशिष्ट जनों का पारदर्शी चयन करना है। इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उद्देश्य यह था कि चयन में पक्ष-विपक्ष और आम जनता का संतुलन बना रहे। लेकिन जिला प्रशासन के डिप्टी कलेक्टर द्वारा जारी पत्र ने इस पूरी व्यवस्था को ही पलट कर रख दिया। प्रशासन ने इस पत्र में खुलेआम और लिखित रूप में यह कबूल किया कि:
भारतीय जनता पार्टी जिला मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर द्वारा प्रस्तावित सूची सहित कुल 25 विशिष्टजनों का चयन कर… भेजा जा रहा है।
यानी जो चयन प्रभारी मंत्री, सांसदों और सर्वदलीय जनप्रतिनिधियों की सामूहिक सहमति से होना था, उसे दरकिनार कर सीधे भाजपा जिला कार्यालय से आई सूची को ही अंतिम और परम सत्य मान लिया गया।
कड़ा विरोध: “यह सीधे तौर पर जनता के पैसे का दुरुपयोग है” — सौरभ मिश्रा (ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष)
इस पूरे प्रशासनिक घालमेल और ‘पर्ची सिस्टम’ पर तीखा हमला बोलते हुए ब्लॉक कांग्रेस कमेटी मनेन्द्रगढ़ के अध्यक्ष सौरभ मिश्रा ने इसे सीधे तौर पर जनता के अधिकारों पर डाका बताया है।
सौरभ मिश्रा ने अपने आधिकारिक बयान में कहा:
सरकारी योजनाएं और धार्मिक यात्राएं पूरे प्रदेश की जनता के लिए होती हैं, न कि किसी एक राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं को खुश करने के लिए। संस्कृति विभाग का स्पष्ट नियम था कि जिले के कलाकारों, साहित्यकारों और पुरातात्विक विशेषज्ञों को इस यात्रा में वरीयता दी जाए। लेकिन मनेन्द्रगढ़ जिला प्रशासन ने सारे कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर केवल भाजपा नेताओं की सूची पर मुहर लगा दी। यह सीधे तौर पर आम नागरिकों और जिले के वास्तविक प्रतिभावान लोगों का अपमान है। कांग्रेस पार्टी इस राजनैतिक तुष्टिकरण और जनता के पैसों की फिजूलखर्ची का पुरजोर विरोध करती है और मांग करती है कि इस पूरी चयन प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच हो। इस पूरे मामले की जांच के लिए हम संस्कृति विभाग के सचिव को पत्र भी लिखेंगे
अंतिम सूची में रसूखदारों का कब्जा, आम जनता हैरान
आधिकारिक सूची गवाह है कि जिले से जिन लोगों को भेजा गया है, वे कोई गुमनाम कलाकार या साहित्यकार नहीं हैं, बल्कि भाजपा के जिला अध्यक्ष, जिला पंचायत सदस्य, मंडल अध्यक्ष जैसे हैवीवेट नेता हैं। जनता के मन में यह तीखा सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में कला, साहित्य, संस्कृति या इतिहास के क्षेत्र में काम करने वाला एक भी योग्य व्यक्ति प्रशासन को नहीं मिला? क्या सरकारी खर्च पर यात्रा करने की एकमात्र योग्यता अब सिर्फ सत्ताधारी दल का पदाधिकारी होना रह गई है?
जनता मांग रही है जवाब !
यह मामला केवल एक यात्रा के प्रबंधन का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र के समर्पण और आम नागरिकों के अधिकारों के हनन का है। सरकारी योजनाएं किसी दल विशेष की निजी संपत्ति नहीं होतीं, वे राज्य के हर टैक्सपेयर के पैसे से चलती हैं। यदि संस्कृति विभाग के नियमों को ताक पर रखकर केवल राजनैतिक तुष्टिकरण के लिए सूचियां बनाई जा रही हैं, तो यह प्रशासनिक निष्पक्षता पर बहुत बड़ा दाग है। जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार को अब जनता की अदालत में इस ‘दस्तावेजी घालमेल’ का जवाब देना होगा। जनता देख रही है, और जनता जवाब मांग रही है!
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