• हाईकमान के भरोसे पर खरे उतरे विजय शर्मा, बिहार की जटिल बिसात पर फेल हुई विपक्ष की घेराबंदी
• ‘दीदी’ के मैनेजमेंट से ओडिशा में ढहा विपक्ष का किला; लता उसेंडी ने साबित किया अपना राजनीतिक लोहा
रविकांत सिंह राजपूत। नई पहल न्यूज नेटवर्क। रायपुर। भारतीय राजनीति के नक्शे पर छत्तीसगढ़ के नेताओं का कद अब केवल प्रदेश तक सीमित नहीं रहा। बिहार और ओडिशा के राज्यसभा चुनावों में मिली प्रचंड सफलता ने यह साबित कर दिया है कि छत्तीसगढ़ का भाजपा नेतृत्व अब राष्ट्रीय स्तर पर ‘गेमचेंजर’ की भूमिका में आ चुका है। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा और भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष लता उसेंडी ने अपनी रणनीतिक चातुर्य से न केवल चुनावी बाजी जीती, बल्कि विपक्ष के मजबूत किलों में सेंध लगाकर एनडीए के लिए अतिरिक्त सीटें सुरक्षित कीं।

विजय शर्मा: बिहार की उलझी बिसात के नए ‘चाणक्य‘
बिहार जैसे राजनीतिक रूप से अस्थिर और चुनौतीपूर्ण राज्य में राज्यसभा चुनाव की कमान संभालना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। राजद द्वारा छठे उम्मीदवार को मैदान में उतारकर मुकाबले को ‘पॉवर गेम’ में बदलने की कोशिश की गई थी। भाजपा नेतृत्व ने उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा को पर्यवेक्षक बनाकर पटना भेजा और उन्होंने अपनी सांगठनिक दक्षता का परिचय देते हुए एनडीए के कुनबे को न केवल एकजुट रखा, बल्कि क्रॉस-वोटिंग की हर संभावना को ध्वस्त कर दिया। सटीक चुनावी प्रबंधन और घटक दलों के बीच अटूट समन्वय ही था कि एनडीए ने शानदार जीत दर्ज की।

लता उसेंडी: ओडिशा में ‘खामोश’ लेकिन ‘मारक’ रणनीति
ओडिशा की राजनीति में अपनी पैठ बना चुकीं लता उसेंडी ने राज्यसभा की 4 में से 3 सीटें भाजपा की झोली में डालकर अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया। प्रभारी के रूप में उन्होंने जमीनी स्तर पर विधायकों के साथ जो समीकरण बैठाए, उसने बीजद और कांग्रेस जैसे दलों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। कार्यकर्ताओं के बीच अपनी सहजता के लिए प्रसिद्ध लता उसेंडी ने शासन और संगठन के बीच अद्भुत संतुलन बनाकर यह जीत सुनिश्चित की।
बड़ा संदेश: छत्तीसगढ़ के ‘विजय रथ’ ने दिल्ली तक मचाई हलचल
इन परिणामों का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि छत्तीसगढ़ के इन दोनों नेताओं ने अपने-अपने प्रभार वाले राज्यों में एनडीए को 1-1 अतिरिक्त सीट दिलाई है। यह सफलता केवल संयोग नहीं, बल्कि सूक्ष्म चुनावी विश्लेषण और माइक्रो-मैनेजमेंट का परिणाम है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बिहार और ओडिशा की इस ‘सर्जिलक स्ट्राइक’ के बाद अब विजय शर्मा और लता उसेंडी की गिनती भाजपा के उन ‘ट्रबलशूटर्स’ (संकटमोचकों) में होने लगी है, जिन्हें पार्टी भविष्य में बड़े राज्यों की जटिल चुनावी लड़ाइयों में उतार सकती है।
जीत के तीन बड़े कारक:
- एकजुटता: विजय शर्मा ने बिहार में गठबंधन के भीतर किसी भी प्रकार के असंतोष को पनपने नहीं दिया।
- जमीनी पकड़: लता उसेंडी ने ओडिशा के स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखकर रणनीति तैयार की।
- आत्मविश्वास: दोनों नेताओं ने मतदान से पहले ही जीत का जो दावा किया था, उसे परिणामों में बदलकर दिखाया
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