स्थापना समारोह विशेष: नारी शक्ति और समकालीन सरोकारों पर साहित्यकारों का मंथन, कविताओं के जरिए बिखरे मानवीय संवेदना के रंग
नई पहल न्यूज नेटवर्क। रायपुर। राजधानी में अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की छत्तीसगढ़ शाखा का स्थापना दिवस समारोह भव्यता के साथ संपन्न हुआ। इस गरिमामय आयोजन में न केवल शब्दों की कलाकारी दिखी, बल्कि साहित्य को समाज और पर्यटन से जोड़ने की नई दृष्टि भी साझा की गई। कार्यक्रम में दिग्गज साहित्यकारों, पत्रकारों और कवियों ने अपनी उपस्थिति से ‘मैत्री’ के संकल्प को और सुदृढ़ किया।
साहित्य और पर्यटन का अनूठा संगम
समारोह की शुरुआत करते हुए संस्था की अध्यक्ष मीता अग्रवाल ने मंच की संस्थापक संतोष श्रीवास्तव के विजन को साझा किया। उन्होंने बताया कि यह संस्था न केवल लेखकों को एक मंच प्रदान कर रही है, बल्कि साहित्यकारों को पर्यटन से जोड़कर सृजन के नए द्वार भी खोल रही है। यह नवाचार लेखन को और अधिक व्यावहारिक और उपयोगी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
विद्वानों का मंथन: लेखन में ‘स्त्री-पुरुष’ का भेद नहीं, केवल ‘लेखक’ की दृष्टि हो
मुख्य अतिथि और प्रख्यात व्यंग्यकार स्नेहलता पाठक ने अपनी व्यंग्य कविताओं से व्यवस्था पर तीखे प्रहार किए। वहीं, अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज ने वैचारिक विमर्श को नई ऊंचाई दी। उन्होंने कहा:
हमारी परंपरा में गार्गी जैसी विदुषियां रही हैं जिन्होंने शास्त्रार्थ में पुरुषों को पराजित किया। लेखन के क्षेत्र में लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि एक ‘लेखक’ के तौर पर सृजन होना चाहिए। महादेवी वर्मा और आशापूर्णा देवी जैसी विभूतियां हमारे लिए प्रेरणा हैं।
विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार प्रज्ञा प्रसाद ने ‘बुरे वक्त का शुक्रिया’ शीर्षक से सकारात्मकता का संदेश दिया, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा। समारोह में छत्तीसगढ़ इकाई की प्रथम अध्यक्ष मंजुला श्रीवास्तव को भावभीनी श्रद्धांजलि भी अर्पित की गई।



काव्य पाठ: जब शब्दों में उतर आई पूरी ‘कायनात’
समारोह के दूसरे सत्र में विभिन्न रचनाकारों ने अपनी प्रतिनिधि पंक्तियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया:
- किरण वैद्य: “काश मैं मोबाइल होती” (व्यंग्य रचना)
- सुधा शर्मा ‘कोयल’: “अगर पुनर्जन्म होता है तो मैं सिर्फ परिचित स्त्री ही बनना चाहूंगी”
- मन्नू लाल यदु: “मोर लुगरा के अचरा देहरा में परगे” (छत्तीसगढ़ी गीत)
- दिनेश गौतम: “शांतला” (कविता)
- भारती अग्रवाल: “आसान नहीं है राम का रास्ता अपनाना”
- विद्या गुप्ता: “सृष्टि की पहली छुअन हर रूप में पहचान हो”
- वृंदा पंचभाई: “उंगलियां हमारे शरीर का सिर्फ अंग नहीं है यह हमें सिखाती है जीवन की सीख”
- मीता अग्रवाल: “जगती ताल सुंदरता अनुपम, पंचतत्व पर आधारित, गिरिवन कानन नदियां करती, तन मन जन को श्रृंगारित”
- मंजू सरावगी: “तपती रेत”
- कल्याणी तिवारी: “मेरे समीप से गुजरती हो पर मुझे ही अनदेखा कर जाती हो”
- कुमार जगदलवी: “अब तो दिखना बंद हो रहे धोती कुर्ता वाले लोग”
- सुनीता विनय वर्मा: “मन की बातें मन ही जाने क्यों मन को छूते बेगाने”
- रत्ना पाण्डेय: “मेरा घर कहां है”
- ईरा पंत: “न जाने कौन सा पल आखिरी हो जाए”
- शशि दुबे: “नहीं रहूंगी मैं तो क्या है मेरे सुरभित गीत रहेंगे”
- सीमा निगम: “देश ने देर से ही सही नारी शक्ति को पहचाना”
- कंचन सहाय: “नारी सिर्फ बिहारी की नायिका नहीं”
- नीलिमा मिश्रा: “हो रहा है अवसान निशा का आ रही पूर्व से लालिमा”
- चंद्रकला त्रिपाठी: “भोर की पहली किरण जागो”
- गंगा शरण पासी: “लोग लगे हैं गणित में कौन जीता कौन हारा”
- सुषमा प्रेम पटेल: “आसमान दृष्टि डाल बाल सूर्य लाल लाल, स्वास्थ्य में सुधार हेतु प्राण वायु पीजिए”
- छबिलाल सोनी: “नारी से न शोभित है सुन ले सकल जहान”
विविध रंगों से सजी शाम
कार्यक्रम में रत्ना पाण्डेय, सुनीता विनय वर्मा, कल्याणी तिवारी, कुमार जगदलवी, ईरा पंत, शशि दुबे, सीमा निगम, कंचन सहाय, नीलिमा मिश्रा, चंद्रकला त्रिपाठी, गंगा शरण पासी, सुषमा प्रेम पटेल और छबिलाल सोनी ने अपनी कविताओं और गीतों से प्रकृति, नारी शक्ति, देशप्रेम और मानवीय मूल्यों पर अपनी बात रखी।
मंच का कुशल संचालन: रत्ना पाण्डेय ने कार्यक्रम की बागडोर संभाली, जबकि आभार प्रदर्शन वृंदा पंचभाई ने किया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से आए बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी और प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे।




