जहां डर था वहां अब उम्मीद है: बीजापुर के जंगलों में गूंजी शिक्षा की आवाज, खुले 16 स्कूल, जुड़े 600 बच्चे

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डर के साये से निकलकर शिक्षा की ओर बढ़े कदम बीजापुर में बदली तस्वीर

नई पहल न्यूज नेटवर्क। बीजापुर | जहां पहले नक्सलियों की धमक और डर का सन्नाटा था, वहां अब बच्चों की मासूम खिलखिलाहट और पढ़ाई की गूंज सुनाई दे रही है। बीजापुर जिले के कोरचोली, तोड़का, एड्समेटा और बड़ेकाकलेड जैसे दुर्गम, नक्सल प्रभावित इलाकों में पहली बार शिक्षा की किरणें पहुंची हैं।

16 स्कूलों में नया सवेरा, 600 सपनों को मिली उड़ान

बीजापुर प्रशासन ने एक साहसी और संवेदनशील पहल के तहत 14 प्राथमिक और 2 माध्यमिक विद्यालयों की शुरुआत की है, जिनमें अब तक 600 से अधिक बच्चों ने दाखिला लिया है। अधिकांश स्कूल झोपड़ियों और अस्थायी टिन शेड्स में चल रहे हैं, लेकिन इन कक्षाओं में बच्चों का जोश किसी आधुनिक स्कूल से कम नहीं है।

‘वेंडे स्कूल दायकाल’ बना शिक्षा का जनआंदोलन

इस बदलाव के पीछे है कलेक्टर संबित मिश्रा के नेतृत्व में शुरू किया गया विशेष अभियान ‘वेंडे स्कूल दायकाल’, जिसमें 2200 से अधिक शिक्षकों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और वालंटियर्स ने 600 गांवों में जाकर 9650 स्कूल से वंचित बच्चों की पहचान की। इसके बाद उम्र और ज़रूरत के अनुसार माइक्रो प्लानिंग करके इन्हें स्कूलों से जोड़ा गया।

जहां कभी सरकार नहीं पहुंची, वहां पहली बार लगी पढ़ाई की क्लास

इन गांवों में आज पहली बार सरकारी तंत्र की प्रभावी मौजूदगी दर्ज हुई है। स्कूलों के जरिए सरकार और ग्रामीणों के बीच विश्वास की दीवार फिर से खड़ी हो रही है। ये स्कूल महज शिक्षा केंद्र नहीं, बल्कि शांति, विकास और संवाद के प्रतीक बनते जा रहे हैं।

फ्री ड्रेस-किताबों से शिक्षा बनी सबके लिए सुलभ

बच्चों को यूनिफॉर्म, किताबें और बैग मुफ्त दिए गए हैं ताकि किसी आर्थिक कमजोरी के कारण कोई भी बच्चा पीछे न रह जाए। एक माता-पिता की आंखों में चमकती उम्मीदें कहती हैं, “पहले हमारे बच्चे जंगलों में भटकते थे, अब वे किताबों से जीवन का रास्ता खोज रहे हैं।”

नक्सलवाद के खिलाफ सबसे असरदार हथियार – शिक्षा

अधिकारियों और शिक्षाविदों का मानना है कि शिक्षा ही वह दीर्घकालिक समाधान है जो हिंसा को जड़ से मिटा सकता है। स्कूलों की यह पहल हथियार के बदले कलम थमाने का अभियान है, जो एक शांत, शिक्षित और आत्मनिर्भर भविष्य की ओर ले जा रहा है।

बदले माहौल में अभिभावकों की भूमिका भी बनी मजबूत

अब गांवों में यह सोच बन रही है कि बच्चों की तरक्की किताबों से ही तय होगी। अभिभावक न सिर्फ सहयोग कर रहे हैं, बल्कि बदलाव के हिस्सेदार बन चुके हैं।

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