
जीवन में खुश रहना सरल है, लेकिन बेहतर बनना एक साधना है।
तारीफ़ सुनना आत्मा को सुकून देता है, लेकिन अक्सर ये सुकून एक मीठे जाल में तब्दील हो जाता है — जहां व्यक्ति अपने लक्ष्य से भटकने लगता है, और प्रशंसा की आदत उसे वास्तविकता से दूर ले जाती है।
जो लोग प्रशंसा के भंवर में फंस जाते हैं, उनके लिए उससे बाहर निकलना कठिन हो जाता है।
ऐसे लोग धीरे-धीरे अपनी असल पहचान और उद्देश्य से दूर चले जाते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि जब भी कोई आपकी तारीफ़ करे, उसे एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दें, और उस ऊर्जा को आत्मबल में बदलकर अपने लक्ष्य पर टिके रहें।

❝ लक्ष्य की राह में अगर थोड़ी आलोचना भी मिल जाए — तो उसे सिर झुकाकर स्वीकार कीजिए। ❞
निंदा, आलोचना या विरोध — ये सब वो आईना हैं जो आपकी कमज़ोरियों को दिखाते हैं।
और जब आप खुद को उन कमज़ोरियों के पार ले जाते हैं — तभी आप सिर्फ अच्छे नहीं, बेहतरीन बनते हैं।


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