
स्कूल स्कूल मर्ज हो गए, सबके सब खुदगर्ज हो गए…
शिक्षा विभाग की युक्तियुक्तकरण नीति के चलते छोटे स्कूलों का बड़े स्कूलों में विलय किया जा रहा है। भले ही इसे प्रशासनिक सुधार कहा जा रहा हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। इस बदलाव से प्रभावित एक शिक्षिका ममता जायसवाल की ये भावनात्मक कविता उस दर्द को उजागर करती है, जिसे न तो आंकड़े दिखा सकते हैं और न ही फाइलों की भाषा समझा सकती है।

कविता : मर्ज का दर्द
स्कूल स्कूल मर्ज हो गए,
सबके सब खुदगर्ज हो गए।
शिक्षक ने अपने सहूलियत से जगह चुनी,
हमारे सपने रह गई धरी की धरी।
दो शिक्षक 5 कक्षा पढ़ाएंगे,
क्या सारे क्लास के बच्चों को एक साथ बिठाएंगे?
सबको पता है कि अच्छी गुणवत्ता वाले शिक्षक सरकारी स्कूल में है,
पर फिर भी प्राइवेट स्कूल की मान्यता हर गांव में है।
सरकारी स्कूल पर इतने पहरे बैठाएं हैं,
क्या कभी प्राइवेट स्कूल का मुआयना करने कोई बड़े अफसर आए हैं?
बीएड वालों को सहायक शिक्षक नहीं बना सकते,
प्राइवेट स्कूलों में बीएड, डीएड नहीं, पढ़ा रहे हैं 12वीं पढ़े बच्चे।
सुना था कि नींव मजबूत होनी चाहिए और होगी भी,
जब पांच कक्षा के बच्चे एक साथ पढ़ेंगे,
शिक्षक पढ़ाएंगे भी और सब काम करेंगे।
क्यों लोग शिक्षक पद को बदनाम कर रहे,
कहते हैं शिक्षक केवल कुर्सी तोड़ रहे,
जबकि वहीं शिक्षक जिसने राम दिया, कलाम दिया, अंबेडकर दिया,
वहीं शिक्षक जो देश का भविष्य गढ़ रहे।
अब अपनी मनसा पूरी करने युक्तियुक्तकरण किया,
शिक्षा को किस बदलाव की आग में झोंक दिया?
अब देखते हैं इसका क्या परिणाम होगा?
शिक्षा का कैसा नया आयाम होगा?


About The Author










































