अपनों ने मुंह मोड़ा, गैरों ने कंधा दिया – अशोक कश्यप की अंतिम यात्रा में इंसानियत हुई जीवित

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रामानुजगंज में एक बुजुर्ग की जिंदगी ने सिखाया ,  रिश्ते खून से नहीं, करुणा से बनते हैं

नई पहल न्यूज नेटवर्क। बलरामपुर-रामानुजगंज। रामानुजगंज के वार्ड क्रमांक 7 में 77 वर्षीय अशोक कश्यप की जीवनगाथा ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि “जो अपने होते हैं, वो खून से नहीं, कर्म से पहचाने जाते हैं। चार वर्षों से बीमार चल रहे अशोक कश्यप का सोमवार की सुबह निधन हो गया। बीमारी और बेबसी के बीच उनका साथ किसी खून के रिश्तेदार ने नहीं, बल्कि मोहल्ले के पड़ोसियों और कुछ अनजान से लगने वाले ‘गैरों’ ने निभाया।

किराएदार नहीं, परिवार का हिस्सा बने – सरस्वती देवी की ममता की मिसाल

अशोक कश्यप बीते चार सालों से सरस्वती देवी के किराए के मकान में रह रहे थे। बीमारी के चलते जब वो काम करने में असमर्थ हो गए, तब सरस्वती देवी ने न केवल किराया माफ किया, बल्कि उन्हें अपने घर में ही मानवीय आधार पर रखा। सरस्वती देवी खुद जीवन संघर्षों से घिरी हुई हैं। पति और दो बेटों की मौत के बाद किराया ही उनकी आजीविका का आधार था — फिर भी उन्होंने कभी इंसानियत से समझौता नहीं किया।

सेवा से साधुता तक – मोहल्ले वालों ने निभाया फर्ज़

बीते एक महीने से अशोक कश्यप मरणासन्न अवस्था में थे। मोहल्ले के महिलाओं ने सेवा, अर्जुन दास (वार्ड पार्षद) ने दाह संस्कार की व्यवस्था, और स्वास्थ्यकर्मी जगदीश दास ने इलाज तक की जिम्मेदारी निभाई। आरएसएस स्वयंसेवक सोहराय कुशवाहा, जो 50 साल पुराने मित्र थे, गढ़वा से अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। वो न केवल अशोक कश्यप को देखने आते थे, बल्कि कई बार सेवा भी करते थे। अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले वह एकमात्र परिचित परिजन थे।

रिश्ते सिर्फ नाम के रह गए

अशोक कश्यप की पत्नी, बेटी, तीन बहनें – सभी गढ़वा जिले में निवासरत हैं और आर्थिक रूप से सक्षम भी हैं। मगर न कोई देखने आया, न दाह संस्कार में शामिल हुआ।

पड़ोसी बने परिजन, भूखा न सोने दिया

अशोक कश्यप जब बीमारी के कारण ₹1 तक जेब में नहीं रहता था, तब अगल-बगल के लोगों ने भोजन, दवा, देखभाल और मानवीय गरिमा की डोर नहीं टूटने दी। बीमारी के अंतिम दिनों में आसपास की महिलाओं ने सेवा में तनिक भी कमी नहीं छोड़ी।

खबर से सबक :

“ज़िंदगी के साथ भी और ज़िंदगी के बाद भी – जिन्हें खून ने ठुकराया, उन्हें मोहल्ले की ममता ने अपनाया। “अशोक कश्यप की अंतिम यात्रा एक तमाचा है उन रिश्तों पर, जो सिर्फ नाम के रह गए। और सलाम है उन ‘गैरों’ को, जो इंसानियत की असली तस्वीर बनकर उभरे।

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