
छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राजनीति उस मोड़ पर आ पहुंची है, जहां नेतृत्व की चुप्पी और कार्यकर्ताओं की बेचैनी टकरा रही है। सोमवार को हुई पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जो सख्त लहजा अपनाया, वह केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि एक पूरी पार्टी के खोते संतुलन की चीख थी। जब बघेल ने नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत से कहा—
“यह पद केवल बैठने के लिए नहीं होता”,
तो यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था, यह विपक्ष की निष्क्रियता पर एक तीखा तमाचा था। कांग्रेस जो कभी विपक्ष में भी जनांदोलनों की ताकत से सत्ता को हिला देती थी, आज अगर उसकी आवाज़ विधानसभा में धीमी है, तो जनता का भरोसा डगमगाना लाज़िमी है।
बघेल की तल्ख़ी महज मंचीय बयानबाज़ी नहीं थी, वह एक आंतरिक विद्रोह की दस्तक थी। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज पर अनुशासनहीनता को लेकर उठाया गया सवाल
“राजनांदगांव के नेता ने मेरे खिलाफ बोला, कोई कार्रवाई क्यों नहीं?”
कांग्रेस संगठन के भीतर “अपनों को छूट, दूसरों को दंड” की दोहरी नीति की पोल खोल देता है।

यह बैठक, जहां सचिन पायलट की उपस्थिति में कांग्रेस के तमाम दिग्गज मौजूद थे
चरणदास महंत, टीएस सिंहदेव, दीपक बैज — उनके सामने भूपेश की दो टूक बातें केवल असंतोष नहीं, एक राजनीतिक बिगुल थीं।
कांग्रेस अगर अभी भी इसे ‘भीतर का मामला’ कहकर टालती है, तो वह 2023 की हार से कुछ नहीं सीखी।
यह चेतावनी नहीं, सलाह है।
यह मांग है, मिन्नत नहीं।
यह परिवर्तन की पुकार है, पर्देदारी की नहीं।
अब सवाल यह नहीं कि बघेल क्यों बोले..सवाल यह है कि क्या पार्टी सुनेगी ?
क्योंकि अगर कांग्रेस भीतर से चुप और बाहर से निष्क्रिय रही,
तो जनता किसी और को विकल्प बनाना शुरू कर देगी।
क्योंकि लोकतंत्र में शोर वो करता है, जो जनता का दर्द समझता है और इस बार यह शोर बघेल ने किया है।
भूपेश बघेल का यह तीखा हस्तक्षेप कांग्रेस के लिए एक सलाह नही, सबक है। अगर संगठन ने इस आंतरिक झटके को गहराई से नहीं समझा, तो पार्टी सिर्फ हार नहीं, हाशिये पर भी चली जाएगी।


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