मर चुका इंसान, फिर भी अदालत में तलब सिस्टम के संवेदनहीन तमाशे का जीवंत सबूत !

नई पहल न्यूज नेटवर्क। भरतपुर। एमसीबी जिले के भरतपुर तहसील से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां मृत घोषित हो चुके व्यक्ति को राजस्व न्यायालय में उपस्थित होने का नोटिस भेजा गया है। इस प्रकरण ने न केवल प्रशासनिक गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता को भी उजागर किया है। प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, ग्राम जनकपुर निवासी प्रेमलाल बैगा, जिनका निधन 5 फरवरी 2023 को हो गया था, उन्हें 23 जुलाई 2025 को तहसील न्यायालय में पेश होने के लिए नोटिस जारी किया गया है। यहां तक कि अदालत की कार्यवाही में यह दर्ज है कि “प्रतिवादी द्वारा अब तक कोई प्रत्युत्तर प्रस्तुत नहीं किया गया। जबकि परिजनों के पास जनकपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र द्वारा जारी मृत्यु प्रमाण पत्र स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि प्रेमलाल बैगा का देहांत लगभग ढाई साल पहले हो चुका है।

प्रशासनिक असंवेदनशीलता या सिस्टम की गलती ?

इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि राजस्व न्यायालयों की प्रक्रिया कितनी असंगत और यांत्रिक हो चुकी है। मृतक को “प्रत्युत्तर प्रस्तुत न करने” का दोषी ठहराना सिर्फ हास्यास्पद नहीं बल्कि अपमानजनक भी है। राजस्व विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड आदेश में भी यही उल्लेख है कि “पेशी में प्रतिवादी उपस्थित नहीं हुए”। यानी मृत्यु प्रमाण पत्र को तवज्जो देना तो दूर, उसे देखा तक नहीं गया!

आदिवासी समाज से न्याय नहीं, मज़ाक मिल रहा है
मृतक प्रेमलाल बैगा एक आदिवासी किसान थे। उनके परिजनों ने बताया कि वे लगातार अधिकारियों को मृत्यु प्रमाणपत्र दिखा चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद दस्तावेजों में उनका नाम जिंदा है। अब इस नोटिस से परिवार मानसिक रूप से परेशान है और इस अव्यवस्था को न्याय के नाम पर क्रूर मजाक बता रहा है।

सवालों के घेरे में राजस्व व्यवस्था :
क्या मृत्यु के बाद भी पेशी की उम्मीद करना सिस्टम का सामान्य व्यवहार बन गया है?
क्या यह “डिजिटल इंडिया” के नाम पर “डिजिटल अन्याय” नहीं?
यदि एक आदिवासी मृतक के लिए यह व्यवहार हो रहा है, तो आम जनता के साथ कैसा न्याय हो रहा होगा?
न्याय या नौटंकी ?
यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वास्तव में गांव-गांव में न्याय पहुंच रहा है, या फिर कागज़ी कार्रवाइयों के नाम पर अब भी नागरिकों को सरकारी तंत्र से प्रताड़ना ही मिल रही है।”भरतपुर में न्यायालय नहीं, फाइलों का भूतिया नाटक चल रहा है – जहाँ मरने के बाद भी इंसान को पेश होना पड़ता है।”


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