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छत्तीसगढ़ विधानसभा में महिलाओं का नया कीर्तिमान : रिकॉर्ड 19 विधायक, लेकिन शीर्ष प्रशासनिक नेतृत्व में आज भी कोई महिला क्यों नहीं ?

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देश में सर्वाधिक महिला विधायकों वाला सदन बना छत्तीसगढ़, 21.11% भागीदारी ने बढ़ाई राजनीतिक धमक, पर प्रशासनिक नेतृत्व में चुप्पी क्यों ?

रविकांत सिंह राजपूत। नई पहल न्यूज नेटवर्क। रायपुर छत्तीसगढ़ ने 19 महिला विधायकों को चुनकर देश भर में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से 19 पर महिला उम्मीदवारों की जीत दर्ज हुई है, जिसका अर्थ है कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में अब 21.11% महिला प्रतिनिधि हैं। यह आंकड़ा किसी भी अन्य राज्य विधानसभा से अधिक है। यह न सिर्फ लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि महिला मतदाता शक्ति (जिनकी संख्या पुरुष मतदाताओं से अधिक है) अब निर्णायक विधायी शक्ति में बदल रही है।

महिलाओं का बढ़ता राजनीतिक दबदबा

​राजनीतिक दलों ने महिलाओं की इस बढ़ती ताकत को समझा और उन्हें चुनावी रण में उतारा। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 15 महिला उम्मीदवारों में से 8 को जीत दिलाई, जबकि विपक्ष की कांग्रेस ने 18 महिला उम्मीदवारों में से 11 को सदन तक पहुंचाया। यह बताता है कि महिलाएं अब सिर्फ ‘वोट बैंक’ नहीं हैं, बल्कि ‘विनिंग कैंडिडेट’ भी हैं।

बीजेपी की विजयी महिलाओं में केंद्रीय मंत्री रेणुका सिंह (भरतपुर सोनहत), सांसद गोमती साय (पत्थलगांव) और पूर्व मंत्री लता उसेंडी (कोंडागांव) जैसी कद्दावर नेता शामिल हैं, जबकि कांग्रेस की तरफ से विद्यावती सिदार (लैलूंगा), मंत्री अनिला भेड़िया (डौंडी लोहारा) और तीन मौजूदा विधायक—उत्तरी जांगड़े, संगीता सिन्हा और सावित्री मंडावी—ने अपनी जीत बरकरार रखी।

देखिए, विजयी महिला विधायकों की सूची

बीजेपी (8)

रेणुका सिंह, लक्ष्मी राजवाड़े, शकुंतला सिंह पोर्ते, उद्देश्वरी पैकरा, रायमुनी भगत, गोमती साय, भावना बोहरा, लता उसेंडी

कांग्रेस (11)

विद्यावती सिदार, उत्तरी जांगड़े, शेषराज हरबंश, चतुरी नंद, कविता प्राण लहरे, अंबिका मरकाम, संगीता सिन्हा, अनिला भेड़िया, यशोदा निलांबर वर्मा, हर्षिता स्वामी बघेल, सावित्री मनोज मंडावी

विरोधाभास का दूसरा पहलू : ‘शीर्ष प्रशासनिक पदों’ पर शून्य उपस्थिति

​एक तरफ जहाँ महिलाएँ विधानसभा में रिकॉर्ड बना रही हैं, वहीं दूसरी तरफ, प्रशासन और न्यायपालिका के सबसे वरिष्ठ पदों पर उनकी अनुपस्थिति बनी हुई है। आपके द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार:

  1. न्यायपालिका: राज्य के उच्च न्यायालय में अब तक 15 मुख्य न्यायाधीशों में से कोई भी महिला नहीं रही है।
  2. नौकरशाही: पिछले 25 वर्षों में राज्य को कोई महिला मुख्य सचिव या पुलिस महानिदेशक (DGP) नहीं मिली है, जबकि इस अवधि में 12-12 अधिकारी इन पदों पर आसीन रहे हैं।

​यह विरोधाभास गंभीर सवाल खड़े करता है: जब छत्तीसगढ़ में प्रति 1000 पुरुषों पर 991 महिलाओं का अनुकूल लिंगानुपात है, महिलाएँ मतदान में पुरुषों से आगे हैं, और वे रिकॉर्ड संख्या में सदन में पहुँच रही हैं, तो शीर्ष प्रशासनिक फैसलों में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका क्यों नदारद है?

‘ग्लास सीलिंग’ तोड़ने की चुनौती

​महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में वृद्धि वास्तविक लोकतंत्र और लैंगिक समानता की बुनियादी शर्त है। छत्तीसगढ़ ने इसे साबित कर दिया है। आईएएस किरण कौशल (2009) और आईपीएस अंकिता शर्मा (2018) जैसी महिलाओं ने नौकरशाही में ज़रूर अपना स्थान बनाया है, लेकिन मुख्य सचिव या डीजीपी जैसे ‘सर्वोच्च’ प्रशासनिक पद पर उनका पहुँचना अभी बाकी है।

यह रिकॉर्ड-तोड़ जीत राज्य में महिलाओं की राजनीतिक शक्ति का प्रमाण है, लेकिन अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह बढ़ी हुई विधायी शक्ति, महिलाओं के लिए विधानसभा अध्यक्ष, विपक्ष का नेता, या शीर्ष प्रशासनिक प्रमुख जैसे निर्णायक नेतृत्वकारी पदों के दरवाज़े खोल पाएगी। यह छत्तीसगढ़ सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसके समाधान से ही सही मायने में ‘आधा आसमान’ हासिल होगा।

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