नई पहल न्यूज नेटवर्क। बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की सियासत में एक बार फिर प्रोटोकॉल और राजनीतिक रसूख की चर्चाएं तेज हो गईं हैं। बिलासपुर में आयोजित होने वाले राज्योत्सव के आधिकारिक आमंत्रण पत्र से स्थानीय विधायक और वरिष्ठ भाजपा नेता अमर अग्रवाल का नाम नदारद होना राजनीतिक गलियारों में बड़े सवाल खड़े कर रहा है
क्या यह महज एक ‘लापरवाही’ है या सियासी खींचतान का हिस्सा ?
छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक और राजकीय पर्व ‘राज्योत्सव’ के आमंत्रण पत्रों में छपी सूची इन दिनों बिलासपुर के राजनीतिक हलकों में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बन गई है। वजह है— शहर के कद्दावर विधायक और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अमर अग्रवाल का नाम निमंत्रण पत्र से गायब होना। सत्ताधारी दल के ही विधायक की उपेक्षा जैसी इस घटना ने एक बार फिर पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी सियासत और समन्वय के आभाव को सतह पर ला दिया है।
प्रोटोकॉल की अनदेखी या सोची-समझी रणनीति ?: किसी भी जिले के मुख्य आयोजन में स्थानीय विधायक का नाम मुख्य पन्नों या आमंत्रण सूची में होना प्रशासनिक प्रोटोकॉल का हिस्सा माना जाता है, लेकिन बिलासपुर में हुई इस चूक ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
- कांग्रेस राज की यादें हुईं ताजा: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कोई पहली बार नहीं है। इससे पहले कांग्रेस शासनकाल के दौरान भी तत्कालीन विधायक शैलेष पांडेय के साथ ऐसे ही प्रकरण सामने आए थे, तब भी इसे लेकर जमकर सियासी बवाल हुआ था। अब भाजपा की अपनी सरकार में इस तरह की पुनरावृत्ति होना कई अनसुलझे इशारे करता है।
- समन्वय और राजनीतिक महत्व पर चर्चाएं तेज: इस घटना के बाद से भाजपा संगठन और जिला प्रशासन के बीच आपसी तालमेल को लेकर कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच सुगबुगाहट शुरू हो गई है। पार्टी के भीतर के सियासी समीकरणों को लेकर तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।
आने वाले दिनों में और गर्मा सकता है मामला
भले ही प्रशासनिक स्तर पर इसे मुद्रण या टाइपिंग की सामान्य त्रुटि कहकर टालने का प्रयास किया जाए, लेकिन बिलासपुर की राजनीति में अमर अग्रवाल के राजनीतिक कद को देखते हुए इसे महज एक सामान्य घटना नहीं माना जा रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा विपक्षी दलों के लिए भी एक बड़ा हथियार बन सकता है और पार्टी के भीतर गुटबाजी की चर्चाओं को और हवा दे सकता है।

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