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जन्मदिन विशेष : राजनीति के धुरंधर हैं बृजमोहन : संवाद, साहचर्य और मधुर व्यवहार से बनी एक शख्सियत

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आप रायपुर में हैं, वक्त कम है- निकलना है, पर लगता है किसी एक आदमी से तो मिल लें। पहला नाम याद आएगा वो है बृजमोहन अग्रवाल का। मैंने जब से राजनीति और अपने समय को देखना शुरू किया, वे रायपुर का सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं। आज भी जब वे राज्य की राजनीति से दिल्ली ‘रवाना’ कर दिए गए हैं, तो भी ‘रायपुर’ उनके दिल में बसता है। रायपुर और बृजमोहन लंबे समय से पर्याय हो गए हैं। रामसागरपारा मोहल्ले से लेकर छात्र राजनीति और बाद में राज्य की राजनीति में चमके बृजमोहन की कथा बहुत रोचक है। अजेय राजनेता और अप्रतिम जनसंपर्क उनकी पहचान है।

​मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक उनके चाहने वालों की रेंज बहुत लंबी है, जिसमें कलाकार हैं, पत्रकार हैं, साहित्यकार हैं, रंगकर्मी हैं और कौन नहीं हैं। आम लोगों के तो वो ‘मोहन भैया’ हैं ही। छत्तीसगढ़ जहां शुक्ल बंधुओं और कांग्रेस की बहुत गहरी जड़ें रही हैं, वहां ऐसी स्थाई लोकप्रियता प्राप्त करना साधारण नहीं था।

चुनावी युद्धों के नायक

​बृजमोहन अग्रवाल चुनाव लड़ रहे हों या चुनाव लड़ा रहे हों, तो वे भाजपा का शुभंकर हैं। उनके मैदान में उतरने मात्र से आधा मैदान मतदान के पहले ही जीत लिया जाता है। वे हैं ही ऐसे। कार्यकर्ताओं के नेता। लोगों के दिलों में उतरे, भरोसे के आदमी। इसलिए राज्य गठन के बाद छत्तीसगढ़ में हुए उपचुनावों में प्रायः उनको ही चुनाव संचालक बनाया जाता रहा। वे जीत की गारंटी हैं।

​उनके लिए हर चुनाव जीतने के लिए होता है। वे दिन-रात परिश्रम कर सकने और अखंड प्रवास करने वाले राजनेता हैं। संयुक्त मध्यप्रदेश में भोपाल में उनका जो जलवा था, उसके रंग आज भी दिखते हैं। आज भी वे भोपाल में हैं तो लोगों से घिरे हैं। छत्तीसगढ़ की स्थापना के 25 साल के बाद भी उनकी पुरानी राजधानी उन्हें भूली नहीं है। बृजमोहन भूलने देते भी नहीं। आप उन्हें याद न करें, लेकिन दीवाली पर, होली पर, आपके जन्मदिन पर अचानक उनकी फोन काल या वाट्सअप मैसेज आपको उनसे जोड़ देगा। राजनेता मतलब के रिश्ते रखते हैं, पर बृजमोहन बेमतलब भी बहुत से रिश्ते रखते हैं। जीवन का बहुत सा हिस्सा मध्यक्षेत्र की राजनीति कर अब वे दिल्ली पहुंचे हैं, लेकिन वे दिल्ली में होकर भी दिल्ली के (दिखावे) में नहीं हैं। सत्ता में लगातार होने ने भी उनको सामान्य बनाए रखा है।

कुर्सी उन पर नहीं, वे कुर्सी पर बैठे

​सामान्य सी राजनीतिक सफलताएं पाकर इतराए और दृश्य से गायब हो गए लोगों की अनेक कथाएं हम जानते हैं। किंतु सातत्य, परंपरा और लोकसंस्कार के बृजमोहन प्रमाण हैं। विरोधी भी उन्हें नजरंदाज नहीं कर पाते। अपने विचारों पर अडिग रहते हुए भी विरोधियों को शत्रु न समझना उन्हें बड़ा बनाता है। वे लगातार कुर्सियों पर बैठे पर कभी कुर्सी उनपर नहीं बैठी।

​उनका आत्मीय भाव ऐसा है कि लगता है हम हमारे भाई, दोस्त या यार से मिल रहे हैं। उनकी व्यस्तता अपार है, लेकिन लगातार लोगों से मिलना उन्हें जीवंत बनाता है। जनता का प्यार ही उनकी शक्ति है। आदरणीय भाभी साहिबा का उन्होंने जिस तरह साथ दिया, पूरे परिवार को साथ लेकर चले, उस पर पूरी किताब अलग से लिखी जा सकती है। पार्टी ने उन्हें बहुत कुछ दिया, पर उन्होंने भी अपनी क्षमता से ज्यादा परिश्रम किया और कठिन स्थितियों में भी दल में बने रहे।

संवाद के सहारे बनाई दुनिया

​मैं उन्हें 1994 से जानता हूं। रामसागरपारा वाले उनके पैतृक मकान के सामने उनका एक कार्यालय हुआ करता था, वहां पहली बार मैंने उन्हें देखा। हमारा गोत्र एक ही था, मैं भी छात्र जीवन में ABVP से जुड़ा रहा और वे भी उसी रास्ते राजनीति में आए। राजनीति में पद, पैसा और प्रभाव अनेक के पास है, किंतु ‘स्वभाव’ बृजमोहन के पास है। उपेक्षाएं उन्हें तोड़ नहीं पायीं क्योंकि जनता का प्यार उनके साथ था।

​सुबह चार बजे तक मिलते रहना मैंने खुद देखा है। मैंने अनेक बार उनसे कहा- “भैया दिनचर्या का तो ख्याल रखिए”, वे हंसकर टाल जाते थे। बीमारियों की उपेक्षा करते हुए, लगातार चाय पीते और पान खाते हुए वे मिलते रहते। एक बार 1996 में वे शेविंग करवा रहे थे, उसी समय मुझे बुला लिया। मुझे अजीब लगा, मैंने कहा- “कुछ तो चैन लीजिए”, पर वे ऐसे ही हैं।

“कहां हो संजय, मैं आ रहा हूं”

​मैं उन दिनों बिलासपुर में था। बृजमोहन जी तब पार्टी से निष्कासित थे, लेकिन वे न सिर्फ अजीत जोगी सरकार के खिलाफ बोलते रहे, बल्कि पार्टी का काम भी करते रहे। वे जब भी बिलासपुर आते, फोन पर उनकी आवाज गूंजती- “कहां हो संजय, बिलासपुर आ रहा हूं। रतनपुर चलेंगे क्या?” उनकी आत्मीयता विरल है।

​बृजमोहन जी यारों के यार हैं। दोस्ती कर ली तो निभाएंगे। देश की राजनीति में जहां जातिगत निर्णय हावी हैं, वहां बृजमोहन का टिका होना जनविश्वास की जीत है। छात्र नेता से दो राज्यों में मंत्री और सांसद बनना साधारण नहीं है। हमारा बीच उनका होना यह आश्वासन है कि राजनीति में अभी ‘मनुष्य’ शेष है। उनका होना यह भी आश्वस्ति देता है कि कलाकारों, पत्रकारों और साहित्यकारों से संवाद के लिए आपका इन कलाओं का जानकार होना जरूरी नहीं, ‘गुणग्राहक’ होना आवश्यक है।

​मेरे जैसे न जाने कितने लोग उन्हें सफल, स्वस्थ और ताकतवर देखना चाहते हैं क्योंकि राजनीति के ऐसे ‘धुरंधर’ रोज पैदा नहीं होते। उनके सुखद जीवन के लिए मंगलकामनाएं।

लेखक:

प्रो. संजय द्विवेदी

(पूर्व महानिदेशक- IIMC, अध्यक्ष- जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल)

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