प्रशासन की बेरुखी से फीका पड़ा साहित्य का सम्मान, मुख्य अतिथि से लेकर आम जनता तक, सबने निभाई दूरी
नई पहल न्यूज नेटवर्क। मनेंद्रगढ़। जिला स्तरीय राज्योत्सव का दूसरा दिन इतिहास में इस बात के लिए दर्ज हो गया कि यहाँ शब्दों का सम्मान नहीं, बल्कि सरकारी उदासीनता का प्रदर्शन हुआ। साहित्य और संस्कृति को समर्पित इस मंच पर, स्थानीय कवियों ने जब अपनी वाणी की तपस्या शुरू की, तो उनकी कविता को सुनने के लिए पंडाल में दर्शक कम, और शर्मसार कर देने वाली खाली कुर्सियां अधिक मौजूद थीं।
परिणाम यह हुआ कि कवियों ने खाली कुर्सियों के बीच नहीं, बल्कि प्रचार-प्रसार के अभाव और प्रशासनिक लापरवाही के बीच कविता पाठ किया। कुर्सियों को देखकर सहज ही यह अंदाजा लगाया जा सकता था कि इस राज्योत्सव को सफल बनाने के लिए जिला प्रशासन कितना सजग था—शून्य प्रतिशत!
कविता पाठ नहीं, यह प्रशासनिक ऑडिट था !
यह केवल एक कवि सम्मेलन नहीं था, बल्कि प्रशासनिक सजगता का एक लाइव ऑडिट था, जिसमें प्रशासन बुरी तरह फेल हो गया। यह विडंबना है कि राज्योत्सव के नाम पर भव्य आयोजन तो हुआ, लेकिन जनता को इसकी भनक तक नहीं लगने दी गई, जिससे कुर्सियां खाली रहीं।


- प्रतिनिधि भी नदारद: गौर करने वाली बात यह है कि कवियों के सम्मान में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि भी नहीं पहुँचे, जिन्होंने पहले दिन मुख्य अतिथि (विधायक रेणुका सिंह) के न आने पर राज्योत्सव का शुभारंभ किया था।
- अफसरों की ‘छुट्टी’: कार्यक्रम की दयनीय स्थिति देखकर यह स्पष्ट है कि बड़े अफसरों और उनके परिजनों ने भी सरकारी कार्यक्रम से दूरी बनाए रखी। यह दर्शाता है कि सरकारी कार्यक्रमों को सफल बनाने की जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित थी, ज़मीनी स्तर पर कोई गंभीरता नहीं बरती गई।
उपेक्षा का काव्य मंचन
जब एक कवि खाली पंडाल में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करता है, तो वह केवल कविता नहीं सुनाता, बल्कि संस्कृति के प्रति शासन की उपेक्षा को मंचित करता है। जिला प्रशासन की इस बेरुखी और प्रचार-प्रसार के घोर अभाव ने यह साबित कर दिया है कि उनके लिए यह उत्सव केवल एक सरकारी औपचारिकता भर था, जिसे निपटा देना ही मुख्य लक्ष्य था।



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