नई पहल न्यूज नेटवर्क। मनेंद्रगढ़। आज जब देशभर के मंदिरों में ‘भए प्रगट कृपाला’ की गूंज है, तब छत्तीसगढ़ के वनांचल में स्थित एक गांव ‘हरचोका’ अपनी एक अलग ही गौरवगाथा सुना रहा है। यह केवल एक गांव नहीं, बल्कि त्रेतायुग के उस इतिहास का साक्ष्य है, जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने 14 वर्षों के वनवास के दौरान छत्तीसगढ़ (तत्कालीन दंडकारण्य) की पावन धरा पर अपना पहला कदम रखा था।
मवई नदी: उत्तर भारत और दंडकारण्य का संगम

अयोध्या के राजमहल से निकलकर कंद-मूल और तपस्वी के वेश में प्रभु श्री राम, माता जानकी और भ्राता लक्ष्मण जब दक्षिण की ओर बढ़े, तो मवई नदी उनके वनवास पथ की पहली गवाह बनी। शोधकर्ताओं का मानना है कि भरतपुर तहसील का यह सुदूर क्षेत्र ही वह बिंदु है, जहां से प्रभु ने अपने ननिहाल की मिट्टी को स्पर्श किया था। आज भी मवई की कल-कल करती धाराएं उस पावन क्षण की अनुभूति कराती हैं।
क्यों खास है ‘हरचोका’? (शिव और रसोई का अद्भुत मेल)

’हरचोका’ नाम का अर्थ ही इसकी दिव्यता को स्पष्ट करता है। यहाँ श्रद्धा और पुरातत्व का एक दुर्लभ संगम देखने को मिलता है:
- ‘हर’ (महादेव की आराधना): स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, वनवास के कठिन मार्ग पर आगे बढ़ने से पहले प्रभु राम ने यहाँ शिवलिंग की स्थापना की थी। यहाँ स्थित प्राचीन प्राकृतिक गुफाओं में आज भी वे मूर्तियां और शिवलिंग मौजूद हैं, जो उस कालखंड की आध्यात्मिकता को जीवंत करते हैं।
- ‘चौका’ (सीता की रसोई): मवई नदी के तट पर स्थित पत्थरों की प्राचीन आकृतियों को श्रद्धालु ‘सीता रसोई’ के रूप में पूजते हैं। कहा जाता है कि वनवास के शुरुआती संघर्ष के दौरान माता सीता ने इसी स्थान पर कंद-मूल से भोजन तैयार किया था।
राम वन गमन पथ: उपेक्षा के अंधेरे से आस्था के उजाले तक
दशकों तक यह ऐतिहासिक स्थल गुमनाम रहा, लेकिन ‘राम वन गमन पर्यटन परिपथ’ योजना ने हरचोका की तकदीर बदल दी है।
”हरचोका अब केवल एक पौराणिक मान्यता नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की अस्मिता का प्रतीक बन चुका है।”
आज रामनवमी के अवसर पर यहाँ का दृश्य विहंगम है। मवई नदी के तट पर नवनिर्मित घाट, भव्य सौंदर्यीकरण और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ यह बता रही है कि छत्तीसगढ़ अपने ‘भांचा राम’ के स्वागत के लिए आज भी उतना ही आतुर है जितना त्रेतायुग में था।

सांस्कृतिक महत्व: यहीं से रची गई छत्तीसगढ़ की ‘राममयी’ संस्कृति
हरचोका से शुरू हुआ यह सफर आगे बढ़कर शिवरीनारायण, राजिम और दण्डकारण्य के घने जंगलों तक गया। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, गीतों और ‘राम-राम’ कहने की परंपरा में जो मिठास है, उसकी जड़ें इसी ‘पहले पड़ाव’ में छिपी हैं।
आज रामनवमी पर हरचोका की माटी को नमन करना, दरअसल उस त्याग और प्रेम को नमन करना है जो प्रभु राम ने इस धरा को दिया था।
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