मुख्यधारा में जनजातीय समाज: पहचान की रक्षा और सशक्तिकरण का युग
भारत का जनजातीय (वनवासी) समाज सदियों से इस देश की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहर का मूल आधार रहा है। प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की उनकी जीवनशैली आज के आधुनिक विश्व के लिए भी एक मार्गदर्शिका है। परंतु, स्वतंत्रता के बाद के दशकों में अपनाई गई कतिपय विसंगतिपूर्ण और भेदभावपरक नीतियों के कारण यह समृद्ध समाज लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से कटा रहा। आज जब हम एक नए भारत की बात करते हैं, तब जनजातीय समाज को केवल एक ‘वोट बैंक’ या नीतिगत चर्चाओं का हिस्सा मात्र मानने के बजाय, उन्हें राष्ट्र निर्माण के अग्रदूत के रूप में स्थापित करना बेहद प्रासंगिक और न्यायसंगत कदम है।
विगत कुछ वर्षों में देश के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव आया है। केंद्र में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान अलग ‘जनजातीय विकास मंत्रालय’ का गठन कर वनवासियों के कल्याण को प्राथमिकता देने की जो शुरुआत की गई थी, उसे वर्तमान नेतृत्व ने एक नई ऊंचाई दी है। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद (राष्ट्रपति) पर जनजातीय समाज की बेटी द्रौपदी मुर्मू का विराजमान होना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि देश का शीर्ष नेतृत्व अब समावेशी विकास के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
कल्याणकारी योजनाएं और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम
केवल प्रतीकों के सहारे किसी समाज का वास्तविक उत्थान संभव नहीं होता; इसके लिए धरातल पर ठोस प्रयासों की आवश्यकता होती है। ‘वनधन योजना’, ‘उज्ज्वला’, ‘किसान सम्मान निधि’, ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ और ‘आयुष्मान भारत’ जैसी योजनाओं ने जनजातीय क्षेत्रों में जीवन स्तर को सुधारा है। विशेषकर, ‘धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान’ और ‘पीएम जनमन कार्यक्रम’ जैसे बड़े अभियानों ने आदिवासियों के सर्वांगीण विकास की नींव रखी है। छत्तीसगढ़ जैसे वनांचल प्रधान राज्य को इन योजनाओं के उत्कृष्ट क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जाना यह दर्शाता है कि नीतियां यदि सही मंशा से लागू की जाएं, तो परिणाम अवश्यंभावी हैं।
वन अधिकारों के स्वामित्व ने न केवल वनांचल के लोगों की आजीविका को सुरक्षित किया है, बल्कि बहुउद्देशीय केंद्रों के माध्यम से खाद्य प्रसंस्करण और महिला स्व-सहायता समूहों को मजबूत कर स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति दी है। ट्राइफेड और नाफेड जैसी संस्थाओं द्वारा लघु वनोपज की सुदृढ़ खरीदी ने आदिवासियों को बिचौलियों के शोषण से मुक्ति दिलाई है।
सांस्कृतिक संरक्षण: समाज को तोड़ने वाली ताकतों से कड़ा मुकाबला
आर्थिक सशक्तिकरण के साथ-साथ इस संपादकीय का सबसे गंभीर और विचारणीय पहलू “संस्कृति के लिए एकजुट होना” और “समाज को तोड़ने वाली ताकतों से सावधान” रहने का आह्वान है। जनजातीय समाज अपनी सरलता और सहजता के लिए जाना जाता है। इसी सरलता का लाभ उठाकर कुछ विदेशी ताकतें, देश विरोधी तत्व और कतिपय सामाजिक समूह भ्रामक प्रचार के जरिए उनकी मूल पहचान को नष्ट करने का प्रयास करते रहे हैं।
जल, जंगल और जमीन की रक्षा करने वाले इस समाज को अपनी मूल जनजातीय संस्कृति, स्थानीय देवी-देवताओं, पारंपरिक पूजा पद्धतियों और रीति-रिवाजों को संजोकर रखना होगा। यदि जनजातीय समाज की सांस्कृतिक जड़ें कमजोर हुईं, तो देश की विविधता और प्राचीन विरासत को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। ऐसे में, समाज के भीतर सामाजिक चेतना और जन-जागरूकता फैलाना समय की सबसे बड़ी मांग है।
निष्कर्ष
दिल्ली के लाल किला मैदान में आयोजित ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ जैसी घटनाएं इस बात का उद्घोष हैं कि जनजातीय समाज अब अपनी पहचान और संस्कृति को लेकर जागरूक हो चुका है। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को ‘गौरव दिवस’ (15 नवंबर) के रूप में मनाना केवल इतिहास के पन्नों को पलटना नहीं है, बल्कि राष्ट्रवाद की उस अलख को जगाए रखना है जिसने देश की स्वतंत्रता और अखंडता को अक्षुण्ण रखा।
समय आ गया है कि पूरा देश वनवासी समाज के इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण में उनके साथ खड़ा हो। समाज को बांटने वाली ताकतों को परास्त करने का एकमात्र तरीका यही है कि हम जनजातीय समाज को आर्थिक रूप से सशक्त बनाएं, उनके अधिकारों का सम्मान करें और उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करें। यही सच्चे अर्थों में एक सुदृढ़, समरस और अखंड भारत का निर्माण होगा।
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