रविकांत सिंह राजपूत
दिल्ली की सड़कें इस समय लोकतंत्र की एक नई इबारत लिख रही हैं। बीते तीन दिनों से जारी छात्रों और युवाओं का शक्ति प्रदर्शन यह साबित कर रहा है कि जब जन-मुद्दों पर बात होती है, तो सत्ता के गलियारों तक उसकी गूंज ज़रूर पहुँचती है। इस पूरे आंदोलन के केंद्र में हैं काकरोज जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने जिस तरह डिजिटल क्रांति का इस्तेमाल किया है, वह अंधेरे में डिजिटल दीपक की तरह जल रहा है। एक ऐसा दीपक जो गोदी मीडिया की चुप्पी और भ्रम के अंधेरे को चीरते हुए सच की रोशनी फैला रहा है। इस छात्र आंदोलन को सबसे बड़ा नैतिक बल मिला है प्रसिद्ध शिक्षाविद, पर्यावरणविद् और समाज सुधारक सोनम वांगचुक के साथ से। लद्दाख के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए अनशन करने वाले सोनम वांगचुक का इस आंदोलन के साथ खड़े होना यह दिखाता है कि युवाओं की यह लड़ाई सिर्फ़ एक तात्कालिक विरोध नहीं, बल्कि देश के भविष्य को बचाने की एक गंभीर मुहिम है। जब वांगचुक जैसा सादगीपसंद विचारक इस आवाज़ को अपना समर्थन देता है, तो आंदोलन को एक नई वैचारिक परिपक्वता और राष्ट्रीय पहचान मिलती है। हम सबने ब्लॉकबस्टर फिल्म 3 इडियट्स देखी है, जिसमें आमिर खान द्वारा निभाया गया फुंसुक वांगडू (रैंचो) का किरदार वास्तव में सोनम वांगचुक के जीवन और नवाचारों से ही प्रेरित था। फिल्म ने हमें सिखाया था कि किताबी ज्ञान से परे जाकर लीक से हटकर सोचना और समाज के लिए व्यावहारिक समाधान ढूंढना कितना ज़रूरी है। आज वही असली रैंचो यानी सोनम वांगचुक, परदे की दुनिया से बाहर निकलकर ज़मीन पर लोकतंत्र, पर्यावरण और युवा अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अभिजीत दीपके का ‘डिजिटल दीपक’ और सोनम वांगचुक का यह व्यावहारिक सत्याग्रह आपस में मिलकर युवाओं को यह संदेश दे रहे हैं कि बदलाव केवल फिल्मों या किताबों में नहीं, बल्कि सड़कों पर उतरकर सवाल पूछने से आता है। जहाँ मुख्यधारा का ‘गोदी मीडिया’ टीआरपी के डिबेट शो में व्यस्त है और दिल्ली के इस बड़े छात्र आंदोलन से आँखें मूँदे बैठा है, वहीं डिजिटल मीडिया एक मशाल बनकर उभरा है। हमारे संविधान की आत्मा असहमति के अधिकार पर टिकी है। सरकार से सवाल करना, नीतियों से असहमत होना और शांतिपूर्ण आंदोलन करना राष्ट्रद्रोह नहीं, बल्कि सच्चे नागरिक होने की पहचान है। जब गोदी मीडिया अपनी रीढ़ खो चुका हो, तब अभिजीत दीपके जैसे पत्रकारों का डिजिटल दीपक बनकर सामने आना और सोनम वांगचुक जैसे विचारकों का साथ मिलना यह साबित करता है कि देश में लोकतंत्र की लौ अभी बुझी नहीं है।
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