महकती वादियों के बीच आस्था और आजीविका का अनूठा संगम

नई पहल न्यूज नेटवर्क। मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर। जब हवाओं में सरई (साल) के फूलों की भीनी-भीनी खुशबू घुलने लगे और वनांचल की हरी-भरी गोद नई कोमल पत्तियों से सज जाए, तो समझ लीजिए कि कुदरत खुद को नए रूप में ढाल रही है। विश्व पर्यावरण दिवस पर छत्तीसगढ़ का नवगठित जिला मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर प्रकृति के इसी अद्भुत उत्सव का गवाह बन रहा है। कहने को तो सरई छत्तीसगढ़ का राजकीय वृक्ष है, लेकिन इस जिले के लिए यह सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि आदिवासियों का कल्पवृक्ष है। जिस पर उनका जीवन, उनकी संस्कृति और उनकी अर्थव्यवस्था की हर एक सांस टिकी है। यही वजह है कि घने जंगलों से घिरे इस क्षेत्र को सरई वनों का द्वीप भी कहा जाता है।
आदिवासी समाज और सरई का अटूट रिश्ता, पेड़ नहीं, साक्षात देवता हैं सरई
जिले के वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समाज और सरई के पेड़ के बीच का रिश्ता सदियों पुराना और बेहद पवित्र है। ट्राइबल कम्युनिटी के लिए सरई का पेड़ कोई आम वनस्पति नहीं, बल्कि उनके सुख-दुख का साथी है। आदिवासी समाज हर शुभ कार्य और त्योहारों पर सरई (साल) के पेड़ की पूरे विधि-विधान से पूजा करता है। सरई के कुंज (सरना स्थल) को देवताओं का निवास स्थान माना जाता है।
इस वृक्ष को कल्पवृक्ष का दर्जा इसलिए मिला है क्योंकि इससे आदिवासियों को आधा दर्जन से ज्यादा बहुमूल्य उत्पाद मिलते हैं। पत्तों से दोना-पत्तल, लकड़ी से मजबूत आशियाना, गोंद (राल), और इसके औषधीय गुण सदियों से आदिवासियों की रक्षा कर रहे हैं।
आजीविका का सबसे बड़ा संबल: सरई के बीजों से चलता है जीवन का पहिया



वर्तमान में जिले के वनांचल क्षेत्रों में सरई के पेड़ों पर नई कोमल पत्तियां आ चुकी हैं और फूलों की महक चारों ओर फैल रही है। इसके बाद आने वाले सरई बीज आदिवासियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होते। गर्मियों के मौसम में आदिवासी परिवारों के बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं सुबह से ही जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं। इन बीजों को इकट्ठा कर और बाजार में बेचकर वे अपनी आजीविका का बड़ा हिस्सा कमाते हैं। तेल, साबुन और अन्य उद्योगों में सरई के बीजों की भारी मांग होती है, जो वनांचल के इस दूरस्थ अंचल में नकदी आय का सबसे मुख्य जरिया है।

बेलबहरा गांव के निवासी और स्थानीय आदिवासी ग्रामीण सुखराम ने अपनी सदियों पुरानी परंपरा और पेड़ के महत्व को साझा करते हुए कहा सरई पेड़ हमारे पुरखों का आशीर्वाद है। हमारे सुख-दुख, पूजा-पाठ और तीज-त्योहार सब इसी पेड़ की छांव में पूरे होते हैं। जब संकट आता है, तो यही पेड़ हमारे बच्चों का पेट पालता है। इसके बीज और पत्तों को बेचकर ही हमारा घर चलता है। हमारे लिए सरई जंगल की लकड़ी नहीं, हमारा भगवान है और इसे बचाना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
राजकीय वृक्ष को सहेजने की चुनौती: क्या मिल पा रहा है सही संरक्षण ?
यह कड़वी सच्चाई है कि सरई (साल) छत्तीसगढ़ का राजकीय वृक्ष होने के बावजूद लंबे समय तक विकास और उस स्तर के वैज्ञानिक संरक्षण से अछूता रहा है, जिसका यह हकदार था। लेकिन बदलते वक्त के साथ अब वन विभाग इसके संवर्धन और आदिवासियों को इसका सही लाभ दिलाने के लिए गंभीर नजर आ रहा है। मनेंद्रगढ़ वन मंडल के डीएफओ चंद्र कुमार अग्रवाल का कहना है कि, मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिला प्राकृतिक रूप से साल (सरई) के वनों से समृद्ध है। यह पेड़ हमारे ईकोसिस्टम और स्थानीय आदिवासी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। वन विभाग पर्यावरण दिवस के अवसर पर संकल्पित है कि इन बहुमूल्य वनों का न केवल वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाएगा, बल्कि सरई वनों के द्वीप कहे जाने वाले इस क्षेत्र में अवैध कटाई को पूरी तरह रोका जाएगा। हमारा मुख्य उद्देश्य आदिवासियों को सरई के लघु वनोपज (जैसे बीज और राल) का सही मूल्य दिलाकर उन्हें आर्थिक रूप से और सशक्त बनाना है, ताकि वे जंगलों को बचाने में हमारे सबसे बड़े भागीदार बने रहें।

कल्पवृक्ष बचेगा, तभी बचेगा हमारा अस्तित्व
जिले के घने जंगलों से उठती सरई के फूलों की यह महक हमें याद दिलाती है कि तरक्की की अंधी दौड़ में हमें अपनी जड़ों को नहीं भूलना है। यदि आज आदिवासी समाज इस कल्पवृक्ष को पूजकर प्रकृति का संतुलन बनाए हुए है, तो आधुनिक समाज का भी यह फर्ज है कि वह इस राजकीय वृक्ष के कुनबे को उजड़ने से बचाए। इस पर्यावरण दिवस पर आइए, इन खूबसूरत सरई वनों को अक्षुण्ण रखने का संकल्प लें, क्योंकि इन पेड़ों के सुरक्षित रहने पर ही वनांचल की संस्कृति और हमारा पर्यावरण सुरक्षित रहेगा।










