सोशल मीडिया पर मोर्चा खोलने के बाद मचा हड़कंप, मुख्यमंत्री के आगमन से पहले प्रशासन ने की डैमेज कंट्रोल की कोशिश
नई पहल न्यूज नेटवर्क। कोरिया। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कोरिया प्रवास से पहले जिले में मचे सियासी घमासान में एक बड़ा मोड़ आया है। ‘नई पहल’ द्वारा जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा और प्रशासनिक मनमानी की खबर प्रमुखता से प्रकाशित किए जाने के बाद प्रशासन की नींद टूटी। सोशल मीडिया पर तीखे वार करने वाली जिला पंचायत सदस्य सौभाग्यवती सिंह के द्वार पर आखिरकार प्रशासन को दस्तक देनी ही पड़ी।
प्रशासन की ‘देर आए दुरुस्त आए’ वाली कार्रवाई
मुख्यमंत्री के आगमन से चंद घंटों पहले मचे बवाल को शांत करने के लिए प्रशासनिक अमला हरकत में आया। दोपहर ठीक 1:30 बजे, जनपद पंचायत कर्मी सादिर खान जिला पंचायत सदस्य सौभाग्यवती सिंह के निवास पहुंचे और उन्हें ससम्मान मुख्यमंत्री के कार्यक्रम का अधिकृत पास सौंपा।

यह कदम उस तीखी फेसबुक पोस्ट के बाद उठाया गया है, जिसमें सौभाग्यवती सिंह ने प्रशासनिक व्यवस्था का बहिष्कार करते हुए सवाल दागा था कि— “क्या बिना संगठन की अनुमति के कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने मुख्यमंत्री से नहीं मिल सकता?”
क्यों ‘सुलगी’ थी विवाद की चिंगारी ?
इस पूरे विवाद की जड़ें दो प्रमुख घटनाओं से जुड़ी हैं जिसने जिले की राजनीति को गर्मा दिया था:
- अमृतधारा महोत्सव में बदसलूकी: रविवार को मनेंद्रगढ़ नगरपालिका अध्यक्ष प्रतिमा सरजू यादव और उनके पति को विशिष्ट अतिथि होने के बावजूद कथित तौर पर रोके जाने से जनप्रतिनिधियों का गुस्सा सातवें आसमान पर था।
- प्रोटोकॉल का उल्लंघन: जनप्रतिनिधियों का सीधा आरोप था कि अधिकारी प्रोटोकॉल का पालन करने के बजाय केवल संगठन के इशारे पर काम कर रहे हैं, जिससे निर्वाचित सदस्यों के मान-सम्मान को ठेस पहुंच रही है।
‘नई पहल’ की खबर का व्यापक प्रभाव
जैसे ही ‘नई पहल’ ने इस खबर को उजागर किया कि कैसे प्रशासन ‘अपनों’ की ही अनदेखी कर रहा है, प्रशासनिक गलियारों में खलबली मच गई। मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान किसी भी प्रकार के विरोध या असहज स्थिति से बचने के लिए आनन-फानन में सौभाग्यवती सिंह तक पहुंच बनाई गई।
बड़ा सवाल : क्या केवल ‘पास’ थमा देने से जनप्रतिनिधियों की नाराजगी दूर हो जाएगी, या फिर अमृतधारा महोत्सव में हुए अपमान की टीस मुख्यमंत्री के सामने भी गूंजेगी?
सम्मान की लड़ाई में जीत ?
सौभाग्यवती सिंह के घर जाकर पास देना इस बात का प्रमाण है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। हालांकि प्रशासन ने ‘डैमेज कंट्रोल’ कर लिया है, लेकिन इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में अधिकारियों को प्रोटोकॉल और जनप्रतिनिधियों के विशेषाधिकारों को लेकर अधिक संजीदा होना पड़ेगा।
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