सूबाई सिपहसालारों ने सदस्यता में आलाकमान को दी पटखनी; छन्नी साहू के आगे बौना साबित हुआ राष्ट्रीय अध्यक्ष का रिकॉर्ड
नई पहल न्यूज नेटवर्क। नई दिल्ली/रायपुर। अखिल भारतीय महिला कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के लिए देश भर में चलाए जा रहे सदस्यता अभियान के जो ताज़ा दस्तावेज़ लीक हुए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश की कमान संभालने वाली राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा सांगठनिक सक्रियता के मामले में अपनी ही कई प्रदेश अध्यक्षों और क्षेत्रीय पदाधिकारियों से कोसों पीछे छूट गई हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे सर्वोच्च पद पर होने के बावजूद अलका लांबा अब तक सिर्फ 1,864 सदस्य ही बना पाई हैं, जो कई राज्यों के सूबाई कप्तानों के आंकड़ों के मुकाबले बेहद बौना है। इस खुलासे के बाद पार्टी के भीतर यह सवाल पुरजोर तरीके से उठने लगा है कि जब सेनापति खुद मैदान में पीछे हो, तो सेना में जोश कैसे भरा जाए?



आंकड़ों का आईना: जब सूबे के सिपहसालारों ने राष्ट्रीय अध्यक्ष को दी पटखनी
महिला कांग्रेस के इस सदस्यता अभियान ने यह साफ कर दिया है कि दिल्ली के वातानुकूलित कमरों और मीडिया कैमरों के सामने सक्रिय रहने वाले चेहरों की तुलना में राज्यों की महिला नेता जमीन पर कहीं ज्यादा पसीना बहा रही हैं।
- अलका लांबा (राष्ट्रीय अध्यक्ष): पूरे देश का प्रभार होने और सबसे बड़ा चेहरा होने के बावजूद उनके खाते में महज 1,864 सदस्य ही दर्ज हैं।
- प्रदेश नेतृत्व और प्राधिकारियों का दबदबा: महिला कांग्रेस की कई प्रदेश अध्यक्षों, राष्ट्रीय पदाधिकारियों और सूबाई नेताओं ने सदस्यता के मामले में अपनी ही राष्ट्रीय अध्यक्ष को पछाड़ दिया है।
- छत्तीसगढ़ का रिकॉर्डतोड़ प्रदर्शन: जमीनी पकड़ का सबसे बड़ा उदाहरण छत्तीसगढ़ में देखने को मिला, जहां पूर्व विधायक छन्नी साहू ने अकेले दम पर पूरे प्रदेश में सर्वाधिक 3,718 सदस्य बना डाले। यह संख्या राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा के कुल आंकड़ों से लगभग दोगुनी है। छत्तीसगढ़ से ही राशि त्रिभुवन महिलांग (2,305 सदस्य) भी राष्ट्रीय अध्यक्ष से काफी आगे निकल चुकी हैं।
पैमाना प्रदर्शन नहीं, तो फिर क्या ?
इन आंकड़ों ने महिला कांग्रेस के भीतर एक बेहद संवेदनशील और गंभीर बहस को हवा दे दी है। संगठन के भीतर दबी जुबान में यह चर्चा आम हो गई है कि महिला कांग्रेस में बड़े पदों और जिम्मेदारियों को बांटने का पैमाना जमीनी पकड़ या सदस्यता का रिकॉर्ड बिल्कुल नहीं है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर संगठन में पद का आधार जमीन पर किया गया काम होता, तो लाखों-हजारों महिलाओं को पार्टी से जोड़ने वाली प्रांतीय नेता आज दिल्ली के शीर्ष पदों पर बैठी होतीं। लेकिन हकीकत इसके उलट है, जिससे यह संदेश जा रहा है कि पार्टी में पद पाने के लिए ‘परफॉर्मेंस’ से ज्यादा ‘समीकरण’ और आलाकमान की परिक्रमा मायने रखती है।
छात्र राजनीति से राष्ट्रीय अध्यक्ष तक: कैसा रहा अलका लांबा का सफर ?
इस विवाद के केंद्र में आईं अलका लांबा का राजनीतिक करियर हमेशा से काफी उतार-चढ़ाव भरा और चर्चाओं में रहा है:
- NSUI से शुरुआत: उन्होंने 1990 के दशक में कांग्रेस के छात्र संगठन से राजनीति सीखी और 1995 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) की अध्यक्ष बनीं।
- आम आदमी पार्टी का रुख: कांग्रेस में लंबे समय तक रहने के बाद वैचारिक और सांगठनिक मतभेदों के चलते उन्होंने 2014 में ‘आप’ का दामन थामा और 2015 में चांदनी चौक से विधायक चुनी गईं।
- कांग्रेस में वापसी और हार: साल 2019 में ‘आप’ से नाता तोड़कर उन्होंने दोबारा कांग्रेस में ‘घर वापसी’ की, लेकिन 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में जनता ने उन्हें नकार दिया और वह अपनी सीट हार गईं।
- बिना जनाधार के मिला शीर्ष पद: चुनावी हार के बावजूद, उनके आक्रामक तेवरों और मीडिया मैनेजमेंट को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की कमान सौंप दी।
सोशल मीडिया की चमक बनाम जमीन की खनक
यह एक्सक्लूसिव रिपोर्ट कांग्रेस आलाकमान के लिए एक बड़ा सबक है। राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा का अपनी ही प्रदेश अध्यक्षों से कम सदस्य बनाना यह साबित करता है कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता और जमीनी हकीकत में बहुत बड़ा अंतर है। यदि कांग्रेस को वास्तव में खुद को मजबूत करना है, तो उसे केवल कागजी या दिल्ली-केंद्रित चेहरों को तवज्जो देने के बजाय छन्नी साहू जैसी उन नेत्रियों को आगे लाना होगा जो जमीन पर संगठन के लिए भीड़ और वोट जुटाने का माद्दा रखती हैं।
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