कलेक्टर संतन देवी जांगड़े का ‘हंटर’ चला, 18 का संलग्नीकरण निरस्त, लेकिन ‘सेटिंग के खेल’ में अब भी खाली पड़े हैं स्कूलों के ब्लैकबोर्ड
नई पहल न्यूज नेटवर्क। मनेन्द्रगढ़। जिले की कमान संभालते ही नई कलेक्टर संतन देवी जांगड़े ने शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में 18 शिक्षकों का संलग्नीकरण निरस्त कर जो ‘ट्रेलर’ दिखाया है, उसकी तारीफ हर जुबां पर है। लेकिन मनेन्द्रगढ़ की जनता अब कलेक्टर मैडम से पूरी ‘पिक्चर’ देखने की उम्मीद लगाए बैठी है। सवाल बड़ा है— 18 का तो हो गया, लेकिन बाकी 109 का कब? लगातार दो सालों से बोर्ड परीक्षा में पूरे छत्तीसगढ़ में अंतिम पायदान पर रहकर शर्मसार हो रहे मनेन्द्रगढ़ जिले के 109 योग्य शिक्षक आज भी स्कूलों में ब्लैकबोर्ड थामने के बजाय सरकारी दफ्तरों और छात्रावासों में ‘बाबूगिरी’ की मलाई चाट रहे हैं। कलेक्टर के इस शुरुआती एक्शन के बाद अब इन रसूखदार और सेटिंगबाज शिक्षकों के खेमे में हड़कंप मच गया है। मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले की सरकारी शिक्षा व्यवस्था इस समय आईसीयू में है। जिस जिले का बोर्ड परीक्षा परिणाम प्रदेश में सबसे आखिरी पायदान पर आकर शर्मसार कर रहा हो, वहां के 109 योग्य शिक्षक स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के बजाय सरकारी दफ्तरों और छात्रावासों में बैठकर ‘बाबूगिरी’ और ‘मलाईदार’ पदों का आनंद ले रहे हैं। सुविधा और सेटिंग के इस खेल ने जिले के ग्रामीण अंचलों की शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह अपाहिज बना दिया है।
हालांकि, जिले की कमान संभालते ही नई कलेक्टर संतन देवी जांगड़े ने इस अव्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया है। शुक्रवार को शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में उन्होंने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए 18 शिक्षकों का संलग्नीकरण तत्काल प्रभाव से निरस्त कर उन्हें मूल पदस्थापना वाले स्कूलों में भेज दिया है। कलेक्टर के इस फैसले की जनता तारीफ तो कर रही है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि शेष 109 रसूखदार शिक्षकों पर कार्रवाई कब होगी?

देखिए संलग्न शिक्षकों की सूची




लगातार दूसरे साल प्रदेश में अंतिम स्थान, फिर भी नहीं जागी नींद
जिले के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि इस वर्ष भी 10वीं और 12वीं के बोर्ड परीक्षा परिणामों में मनेन्द्रगढ़ जिला पूरे छत्तीसगढ़ में सबसे निचले पायदान पर रहा। पिछले वर्ष भी 12वीं के नतीजों ने जिले की साख को मिट्टी में मिलाया था। लगातार दो सालों से मिल रही इस करारी शिकस्त के बाद भी शिक्षा विभाग के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है।
खोखले साबित हो रहे NGO के प्रशिक्षण:
बच्चों की पढ़ाई के नाम पर शिक्षकों को एनजीओ के माध्यम से बड़े-बड़े प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं। कागजों पर लाखों खर्च हो रहे हैं, लेकिन धरातल पर ये प्रशिक्षण पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं। जब शिक्षक स्कूल ही नहीं जाएंगे, तो ट्रेनिंग का लाभ बच्चों को कैसे मिलेगा?
गणित, विज्ञान और अंग्रेजी के शिक्षक लापता; अतिथि शिक्षकों के भरोसे स्कूल
ग्रामीण क्षेत्रों के दर्जनों स्कूल या तो पूरी तरह शिक्षक विहीन हो चुके हैं या फिर एक अकेले शिक्षक के भरोसे रामभरोसे चल रहे हैं।
- महत्वपूर्ण विषयों पर संकट: गणित, विज्ञान और अंग्रेजी जैसे मुख्य विषयों के व्याख्याता छात्रावासों में अधीक्षक बनकर बैठे हैं।
- अतिथि शिक्षकों का सहारा: स्कूलों की व्यवस्था अस्थायी अतिथि शिक्षकों के सहारे है। नियुक्ति अस्थायी होने के कारण न तो पढ़ाई में निरंतरता है और न ही शिक्षा की गुणवत्ता।
- अभिभावकों में भारी आक्रोश: जनप्रतिनिधियों और पालकों का कहना है कि शिक्षा विभाग की इस घोर लापरवाही का खामियाजा गरीब आदिवासियों के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।
शिक्षकों को पढ़ाने से ज्यादा ‘बाबूगिरी’ पसंद !
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग गैर-शैक्षणिक कार्यों और विभागों में जमे इन 109 शिक्षकों में से कई बेहद योग्य और विषय विशेषज्ञ हैं। अगर ये कक्षाओं में लौटें, तो जिले का परीक्षा परिणाम सुधर सकता है। लेकिन रसूख और राजनैतिक पहुंच के दम पर इन शिक्षकों को बच्चों के भविष्य से ज्यादा दफ्तरों की ‘बाबूगिरी’ रास आ रही है।
अब कलेक्टर संतन देवी से ही बची है अंतिम उम्मीद
कलेक्टर संतन देवी जांगड़े द्वारा 18 शिक्षकों का संलग्नीकरण रद्द करने के बाद अब जिले के प्रबुद्ध नागरिकों और अभिभावकों की उम्मीदें उनसे और बढ़ गई हैं। लोगों का साफ कहना है कि:
बच्चों का भविष्य किसी भी प्रकार की राजनैतिक सुविधा, प्रभाव या व्यवस्थागत समझौते से बहुत बड़ा है। जब तक सभी 109 शिक्षकों को उनके मूल स्कूलों में वापस नहीं भेजा जाता, तब तक मनेन्द्रगढ़ की शिक्षा व्यवस्था में सुधार असंभव है।
अब देखना होगा कि नई कलेक्टर का यह ‘सफाई अभियान’ इन 109 मलाईदार पदों पर बैठे शिक्षकों तक कब पहुंचता है और मनेन्द्रगढ़ के नौनिहालों को उनका हक कब मिलता है।
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