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छत्तीसगढ़ में उतरा ‘मिनी केदारनाथ ‘: मनेंद्रगढ़ के 1200 फिट ऊंचे सिद्धबाबा पहाड़ पर मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा, 6 साल की तपस्या के बाद साकार हुआ भव्य धाम

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121 साल पुराने तपोस्थान का कायाकल्प, 3 करोड़ की लागत से ओडिशा के शिल्पकारों ने पत्थरों पर उकेरी केदारनाथ की हुबहू छवि

नई पहल न्यूज नेटवर्क। मनेंद्रगढ़। जिले में शुक्रवार का दिन इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से दर्ज हो गया। पहाड़ों की ठंडी वादियों और घने जंगलों के बीच बसे प्राचीन सिद्धबाबा मंदिर में शुक्रवार को वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और डमरू की गूंज के बीच भव्य ‘प्राण प्रतिष्ठा समारोह’ संपन्न हुआ। जब मंदिर के शिखर से पट खोले गए, तो वहां मौजूद हजारों श्रद्धालुओं की आंखों से श्रद्धा के आंसू छलक पड़े। उत्तराखंड के केदारनाथ धाम की हुबहू तर्ज पर बने इस मंदिर का दिव्य स्वरूप ऐसा है, मानो साक्षात शिव शंभू हिमालय को छोड़कर मनेंद्रगढ़ की पहाड़ियों पर आकर विराजमान हो गए हैं। तीन दिवसीय इस महोत्सव में न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और प्रयागराज से आए साधु-संतों और श्रद्धालुओं का ऐसा सैलाब उमड़ा कि पूरा क्षेत्र ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।

6 साल की कठिन साधना और 3 करोड़ का भव्य समर्पण
इस भव्य देवालय को वर्तमान स्वरूप देने में लगभग 6 साल का लंबा समय लगा है। साल 2020 (फरवरी) से केदारनाथ की तर्ज पर इस जीर्णोद्धार कार्य की शुरुआत हुई थी। सिद्ध बाबा सेवा समिति और जनसहयोग के माध्यम से इस पावन कार्य में लगभग 3 करोड़ रुपये की लागत आई है। इसके अलावा, हाल ही में राज्य शासन द्वारा इसके ईको-पर्यटन और पहुंच मार्ग के विकास के लिए 74 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि भी स्वीकृत की गई है, ताकि इस पूरे पहाड़ी क्षेत्र को एक बड़े धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके।

ओडिशा के शिल्पकारों का जादुई हुनर
इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी वास्तुकला है। केदारनाथ मंदिर की तरह दिखने वाली इस नक्काशी को जीवंत करने के लिए ओडिशा के विशेष नक्काशीदार कारीगरों को बुलाया गया था। इन शिल्पकारों ने महीनों दिन-रात मेहनत करके पत्थरों पर वह जादुई कलाकृति उकेरी है, सड़क मार्ग से करीब 1200 फिट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर की लंबाई 65 फीट, चौड़ाई 30 फीट है और इसका गर्भ गृह 16 फीट का है।

इतिहास: 1905 से शुरू हुआ था आस्था का सफर
सिद्धबाबा मंदिर का इतिहास बेहद गौरवशाली और चमत्कारी माना जाता है। इतिहास और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस तपोस्थली पर सिद्धबाबा भोलेनाथ की स्थापना साल 1905 में हुई थी यह करीब 121 साल पुराना इतिहास समेटे हुए है। शुरुआत में यह ऊंचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच एक छोटी सी गुफा और धुनी के रूप में था, जहां दूर-दूर से नागा साधु और अघोरी तपस्या करने आते थे। यहाँ का शिवलिंग स्वयंभू और अत्यंत जाग्रत माना जाता है। भक्तों की मान्यता है कि जब तक बाबा का बुलावा न आए, कोई इस पहाड़ी पर पैर भी नहीं रख सकता। लेकिन जो एक बार सच्ची श्रद्धा से झोली फैलाकर यहाँ आ गया, बाबा उसे कभी खाली हाथ नहीं भेजते।

संयोग: मंदिर निर्माण शुरू होते ही मनेंद्रगढ़ बना ‘जिला’
स्थानीय लोग इस मंदिर के निर्माण को एक बड़े दैवीय चमत्कार से भी जोड़कर देखते हैं। दशकों से मनेंद्रगढ़ को अलग जिला बनाने की मांग चल रही थी। जैसे ही फरवरी 2020 में इस केदारनाथ स्वरूप मंदिर के निर्माण की नींव रखी गई, उसके कुछ समय बाद ही मनेंद्रगढ़ को नए जिले की सौगात मिल गई। लोग इसे सिद्धबाबा का ही आशीर्वाद मानते हैं। मनेंद्रगढ़ का यह सिद्धबाबा धाम अब न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे मध्य भारत के लिए आस्था, पर्यटन और स्थापत्य कला का एक नया और अद्भुत केंद्र बन चुका है।

सामाजिक सौहार्द : मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले मनेंद्रगढ़ शहर में शोभायात्रा निकली जिसका स्वागत मुस्लिम समझ के लोगो ने भी किया

एक नज़र में सिद्धबाबा धाम की भव्यता

​मंदिर का स्वरूप: उत्तराखंड के श्री केदारनाथ धाम की तर्ज पर

​दर्शन क्षमता: एक साथ 500 श्रद्धालु कर सकेंगे बाबा के दर्शन

​कुल निर्माण लागत: लगभग 3 करोड़ रुपये (समिति व जनसहयोग से)

​निर्माण में लगा समय: लगभग 6 वर्ष (फरवरी 2020 से अनवरत)

​ऐतिहासिक प्राचीनता: 120 वर्ष पुराना इतिहास (खदान मजदूरों द्वारा स्थापना)

​मुख्य शिल्पकार: ओडिशा के विशेष नक्काशीकार

​सड़क मार्ग से ऊंचाई: लगभग 1200 फिट ऊंची पहाड़ी पर स्थित

​मंदिर का कुल माप: लंबाई 65 फीट, चौड़ाई 300 फीट, शिखर 55 फीट

​मुख्य मेला आयोजन: हर वर्ष मकर संक्रांति पर विशाल मेला

​विशेष प्रशासनिक सौगात: मंदिर निर्माण शुरू होते ही मनेंद्रगढ़ बना जिला

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