मनेन्द्रगढ़ वनमंडल में ‘अपनों’ पर मेहरबानी ? तबादला सूची से ‘रसूखदार’ बाबू गायब, सुलगते सवाल!

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मलाईदार कुर्सियों पर बरसों से कुंडली मारकर बैठे बाबुओं को किसका संरक्षण ? भ्रष्टाचार की परतें खुलने का डर या सियासी रसूख पड़ रहा भारी ?

नई पहल न्यूज नेटवर्क। मनेन्द्रगढ़। वनमंडल में हाल ही में जारी हुई कर्मचारियों की नवीन कार्य आबंटन (तबादला) सूची ने विभाग के भीतर एक नया बवंडर खड़ा कर दिया है। कहने को तो यह प्रशासनिक फेरबदल है, लेकिन चर्चा इस बात की है कि आखिर वे ‘खास चेहरे’ कौन हैं, जिन्हें इस सूची से बड़ी चतुराई के साथ बाहर रखा गया है? बरसों से एक ही मेज और एक ही कुर्सी को अपनी जागीर समझने वाले बाबुओं का नाम गायब होने से अब विभाग की पारदर्शिता पर गंभीर सवालिया निशान लग रहे हैं।

तबादला या महज ‘खानापूर्ति’ ?

​वनमंडल कार्यालय द्वारा जारी आदेश के बाद जहां कुछ कर्मचारियों के कार्यक्षेत्र बदले गए हैं, वहीं मलाईदार पदों पर काबिज बाबुओं को छुआ तक नहीं गया है। सूत्रों की मानें तो यह महज एक ‘कॉस्मेटिक’ बदलाव है, ताकि ऊपरी तौर पर यह दिखाया जा सके कि काम हो रहा है, जबकि पर्दे के पीछे का खेल कुछ और ही है।

इन ‘खास’ बाबुओं की ताकत का क्या है राज ?

​विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि जिन बाबुओं के नाम सूची से नदारद हैं, उनकी जड़ें विभाग में इतनी गहरी हैं कि उन्हें हिला पाना आसान नहीं। इसके पीछे दो बड़े कारण बताए जा रहे हैं:

  • ​मजबूत सियासी कवच: इन बाबुओं की सत्ता के गलियारों में सीधी पैठ है, जिसके चलते अधिकारी भी उन पर हाथ डालने से कतराते हैं।
  • ​भ्रष्टाचार का पिटारा: चर्चा आम है कि यदि इन ‘पुराने खिलाड़ियों’ की कुर्सियां हिलीं, तो विभाग में पिछले कई वर्षों से दबे करोड़ों रुपये के घोटाले और वित्तीय अनियमितताएं उजागर हो सकती हैं। खुद को बचाने के लिए व्यवस्था ही इन्हें संरक्षण दे रही है।

विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों ने साधी चुप्पी !

​हैरानी की बात यह है कि कुछ समय पहले तक जिस मनेन्द्रगढ़ वनमंडल में घोटालों को लेकर भाजपा और कांग्रेस, दोनों ने ही मोर्चा खोल रखा था, आज वे इस मुद्दे पर मौन नजर आ रहे हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि शोर मचाने वाले नेता अब ठंडे बस्ते में चले गए? क्या यह ‘मौन’ किसी बड़े समझौते का संकेत है?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या डीएफओ (DFO) साहब इन गंभीर आरोपों पर संज्ञान लेंगे? क्या वनमंडल में सचमुच पारदर्शिता आएगी या फिर रसूखदार बाबुओं का एकाधिकार इसी तरह कायम रहेगा? जनता की नजरें अब प्रशासनिक न्याय पर टिकी हैं।

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