खनिज अधिकारी की रेड में DV प्रोजेक्ट नहीं दिखा पाया रॉयल्टी पर्ची, आम खेरवा मरीन फॉसिल पार्क के पास रात के अंधेरे में पोकलेन और हाइवा से हो रहा रेत का अवैध खेल
नई पहल न्यूज नेटवर्क। मनेन्द्रगढ़। विकास की आड़ में विनाश का एक ऐसा ही खेल मनेन्द्रगढ़ में खेला जा रहा है, जहाँ एक तरफ तो जनहित के लिए मेडिकल कॉलेज का निर्माण हो रहा है, लेकिन दूसरी तरफ इसी निर्माण की आड़ में क्षेत्र की लाइफलाइन कही जाने वाली ‘हसदेव नदी’ और करोड़ों साल पुरानी ‘विश्व धरोहर’ को दांव पर लगा दिया गया है।
परसगढ़ी में डी.वी. प्रोजेक्ट (DV Project) द्वारा मेडिकल कॉलेज का निर्माण कराया जा रहा है। इस महापरियोजना के लिए हजारों गाड़ी रेत और गिट्टी की जरूरत है। लेकिन मनेन्द्रगढ़ के आस-पास कोई वैध बालू घाट न होने के कारण, इस प्रोजेक्ट की आड़ में रेत के अवैध उत्खनन और परिवहन का एक ऐसा मकड़जाल बुन दिया गया है, जिसने प्रशासन से लेकर पर्यावरणविदों की नींद उड़ा दी है।

खनिज अधिकारी की रेड: रॉयल्टी मांगने पर उड़े होश, जांच के घेरे में प्रोजेक्ट संचालक
शुरुआत में छोटे ट्रैक्टर चालक नदी-नालों से अवैध रूप से रेत लाकर डी.बी. प्रोजेक्ट के डंपिंग यार्ड में खपा रहे थे, जिन पर खनिज विभाग ने कई बार रास्ते में कार्रवाई भी की। लेकिन खेल तब उजागर हुआ जब खनिज अधिकारी दयानंद तिग्गा ने सीधे डी.बी. प्रोजेक्ट के मेडिकल कॉलेज निर्माण स्थल पर ही छापा मार दिया।
बड़ा खुलासा: छापे के दौरान जब खनिज अधिकारी ने मौके पर डंप रेत की रॉयल्टी पर्ची मांगी, तो डी.बी. प्रोजेक्ट के पैर तले जमीन खिसक गई। प्रोजेक्ट संचालक रेत के वैध दस्तावेज और रॉयल्टी दिखाने में पूरी तरह नाकाम रहे। अब यह पूरा मामला खनिज विभाग और प्रोजेक्ट संचालक के बीच गहरी जांच का विषय बन चुका है कि आखिर बिना रॉयल्टी की इतनी भारी मात्रा में रेत वहाँ कैसे डंप की जा रही थी ?
हद हो गई! अंग्रेजों के जमाने के रेलवे पुल तक बना दी ‘अवैध सड़क’
रसूखदारों के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि उन्होंने कानून को ठेंगे पर रख दिया है। आम खेरवा पंचमुखी हनुमान मंदिर और देश के इकलौते गोंडवाना मरीन फॉसिल पार्क के ठीक नीचे, जहाँ अंग्रेजों के जमाने का ऐतिहासिक रेलवे पुल मौजूद है, वहाँ तक रेत माफियाओं ने रेत निकालने के लिए बाकायदा एक अवैध सड़क का निर्माण कर डाला है।
एक तरफ वन विभाग की ‘धरोहर’ बचाने की जंग, दूसरी तरफ माफिया का ‘रात में राज
यह स्थिति बेहद विरोधाभासी और चिंताजनक है:
- दिन का उजाला (वन विभाग का पहरा): वन विभाग के कर्मचारी दिन-रात मुस्तैद रहकर करोड़ों साल पुराने जीवाश्म (मरीन फॉसिल पार्क) जैसी वैश्विक धरोहर को बचाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।
- रात का अंधेरा (माफिया का तांडव): जैसे ही रात का अंधेरा घिरता है, नदी के दूसरे छोर पर बड़े व्यावसायिक और रसूखदार लोग मौका देखकर अपनी भारी-भरकम मशीनों (पोकलेन/जेसीबी) और बड़े हाइवा गाड़ियों के साथ नदी में उतर जाते हैं। रात के सन्नाटे में हसदेव नदी का सीना चीरकर धड़ल्ले से रेत निकाली जा रही है।
बड़ा सवाल: विकास की कीमत पर विनाश क्यों ?
मेडिकल कॉलेज मनेन्द्रगढ़ के लिए एक बड़ी सौगात है, लेकिन क्या किसी सरकारी या बड़े प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए प्रकृति और विश्व धरोहर को नष्ट करने की खुली छूट दी जा सकती है?
मरीन फॉसिल पार्क के ठीक नीचे और ऐतिहासिक रेलवे पुल के पास इस तरह का अवैध उत्खनन न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है, बल्कि उस रेलवे पुल के अस्तित्व के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है। अब देखना यह है कि खनिज विभाग की इस कार्रवाई के बाद क्या डी.बी. प्रोजेक्ट पर कोई बड़ी दंडात्मक कार्रवाई होती है, या फिर रात के अंधेरे में हसदेव नदी को खोखला करने का यह खेल यूँ ही चलता रहेगा?
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