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कार्यवाही या संवेदनहीनता : ‘अंधेरी’ दुनिया में उजड़ गया ‘आशियाना’! आंखों से लाचार मुन्नी बाई के सिर से छिनी छत, वन विभाग की कार्रवाई ने खड़े किए मानवीय सवाल

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दर्दनाक : बीमार पति और छोटे बच्चों के साथ दर-दर भटकने को मजबूर दृष्टिहीन महिला; विभाग ने तोड़े निर्माणाधीन मकान, पर ममता की पुकार अनसुनी

क्या नियम इतने कठोर हैं कि बेसहारा की बेबसी भी नहीं दिखी ?

नई पहल न्यूज नेटवर्क। जनकपुर। कहते हैं कानून की आंखें अंधी होती हैं, लेकिन जब कानून का हाथ किसी ऐसी महिला की छत छीन ले जो खुद दोनों आंखों से देख नहीं सकती, तो सवाल व्यवस्था की संवेदनाओं पर खड़े होते हैं। मनेंद्रगढ़ वनमंडल के कुंवारपुर परिक्षेत्र से एक ऐसी ही मर्माहत करने वाली तस्वीर सामने आई है, जहाँ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में एक दृष्टिहीन महिला मुन्नी बाई का आशियाना उजाड़ दिया गया।

भय और बेबसी की दास्तां

जनकपुर नगर पंचायत के कम्पार्टमेंट क्रमांक 1271 में जब वन विभाग का अमला अतिक्रमण हटाने पहुँचा, तो वहां अफरा-तफरी मच गई। मिट्टी और झिल्ली से अपने सपनों का महल बुन रही मुन्नी बाई को यह तक नहीं पता था कि उनके चारों ओर क्या हो रहा है। जब तक वह कुछ समझ पातीं, विभाग की टीम ने निर्माणाधीन ढांचे को ध्वस्त कर दिया। मुन्नी बाई दोनों आंखों से पूरी तरह दृष्टिहीन हैं, उनके पति टीबी जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे हैं और छोटे-छोटे मासूम बच्चों का भविष्य अब खुले आसमान के नीचे आ गया है।

साहब, अब मैं कहाँ जाऊं ?

लाल साड़ी पहने और आंखों में बेबसी लिए मुन्नी बाई ने सिसकते हुए अपनी पीड़ा साझा की। उन्होंने बताया, “मैं अंधी हूँ, पति बीमार हैं, छोटे बच्चे हैं… पारिवारिक कलह के कारण अलग रहने को मजबूर थी, इसलिए यहाँ ठिकाना बना रही थी। वन विभाग ने मेरा घर तोड़ दिया और लकड़ी भी ले गए। अब मेरे पास सिर छुपाने की भी जगह नहीं है।” मुन्नी बाई का यह सवाल आज प्रशासन के गलियारों में गूँज रहा है कि क्या एक दिव्यांग महिला के लिए नियम पुनर्वास से बड़े हो गए?

विभाग का तर्क और ग्रामीणों का आक्रोश

इस कार्रवाई पर वन विभाग के फॉरेस्टर रामायण शर्मा का कहना है कि वनभूमि पर अवैध अतिक्रमण की शिकायत मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई की गई है और विभाग वनभूमि पर किसी भी तरह का कब्जा बर्दाश्त नहीं करेगा। वहीं, अन्य कब्जाधारी बनवसिय (आसमानी साड़ी) ने भी अपनी व्यथा सुनाई कि किस तरह उनके रहने के ठिकानों को उजाड़ दिया गया।

‘नई पहल’ की अपील: न्याय और पुनर्वास की दरकार

यह मामला अब केवल ‘अतिक्रमण बनाम वन विभाग’ का नहीं रह गया है। यह एक दिव्यांग महिला और उसके बीमार परिवार के जीवन और मरण का प्रश्न बन गया है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि नियम अपनी जगह हैं, लेकिन मानवीय आधार पर मुन्नी बाई को तत्काल रहने की व्यवस्था और राहत दी जाए।

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