विशेष संवाद : नई पहल की खास बातचीत
प्रशासन में सफलता कागजों में नहीं बल्कि जनता के जीवन में बदलाव से तय होती है”
नई पहल न्यूज नेटवर्क। रायपुर। छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है, जहाँ प्रदेश के 33 में से 12 जिलों की बागडोर महिला आईएएस अधिकारियों के हाथों में है। इस प्रशासनिक बदलाव, संवेदनशीलता, चुनौतियों और महिला सशक्तिकरण के वास्तविक मायनों पर ‘नई पहल’ ने सूरजपुर जिले की कलेक्टर आईएएस रेना जमील से सीधी और खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस एक्सक्लूसिव संवाद के प्रमुख अंश।

सवाल-जवाब: सूरजपुर कलेक्टर आईएएस रेना जमील के साथ
प्रश्न 1. छत्तीसगढ़ के 12 जिलों में इस समय महिला कलेक्टरों की जिम्मेदारी है। आप इस बदलाव को किस रूप में देखती हैं?
उत्तर: मैं इसे प्रशासन में बढ़ती विविधता और बदलती सोच के रूप में देखती हूँ। मेरे लिए महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि कितनी महिलाएं पद पर हैं, बल्कि यह है कि आज नेतृत्व के अवसर अधिक व्यापक रूप से उपलब्ध हैं।
इतनी संख्या में महिला कलेक्टरों का होना निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है। इससे खासकर युवा लड़कियों को यह संदेश जाता है कि प्रशासनिक नेतृत्व उनके लिए भी पूरी तरह सम्भव है। शायद आने वाले समय में यह संख्या चर्चा का विषय भी न रहे—क्योंकि महिला नेतृत्व सामान्य बात बन जाए, यही असली बदलाव होगा।
मैं इसे “महिला बनाम पुरुष” के नज़रिए से नहीं देखती। जब चयन सिर्फ काबिलियत और मेहनत के आधार पर होता है, तो नतीजा खुद-ब-खुद विविध दिखने लगता है — आज छत्तीसगढ़ के 12 जिलों की तस्वीर यही बताती है।
पर असली फ़र्क़ आंकड़ों में नहीं, उसके असर में है। जब किसी गांव या कस्बे की बेटी अपने जिले की कलेक्टर को एक महिला के रूप में देखती है, तो कलेक्टर की कुर्सी उसके लिए दूर का सपना नहीं रह जाती — वो सोचने लगती है, “अगर वो कर सकती हैं, तो मैं भी कर सकती हूं।” यही सबसे बड़ी उपलब्धि है — यह भरोसा, जो अगली पीढ़ी तक जाएगा।
प्रश्न 2. आपके अनुभव में, महिला कलेक्टर के रूप में काम करने का सबसे महत्वपूर्ण सकारात्मक पहलू क्या रहा है?
उत्तर: मुझे लगता है इसका सबसे बड़ा फायदा “सुनने” में है। मैंने देखा है कि जब कोई महिला घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न या पारिवारिक विवाद की शिकायत लेकर आती है, तो वो अक्सर पहले झिझकती है — पूरी बात नहीं बताती। लेकिन जब उसे लगता है सामने बैठी अधिकारी भी एक महिला है, तो वो झिझक टूट जाती है। व जो बात दस लोगों को नहीं बता पाई, वो कलेक्टर के सामने खुलकर रख देती है। यह भरोसा फैसले जल्दी और सही लेने में मदद करता है।
पर मैं इसे “महिला होने की खासियत” नहीं मानती। मैंने कई पुरुष अधिकारियों को भी उतनी ही संवेदनशीलता से काम करते देखा है। असल में लोग अधिकारी के लिंग (जेंडर) को नहीं, उसकी नीयत को पहचानते हैं — और नीयत का कोई लिंग (जेंडर) नहीं होता।
प्रश्न 3. क्या आपको लगता है कि महिला अधिकारी कुछ सामाजिक मुद्दों को अलग दृष्टिकोण से देख पाती हैं?
उत्तर: हां, कुछ मामलों में व्यक्तिगत अनुभव किसी मुद्दे को समझने में मदद जरूर कर सकता है। जैसे महिलाओं की सुरक्षा, मातृत्व स्वास्थ्य या यौन उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों में एक महिला अधिकारी को कुछ पहलुओं को अपने अनुभवों के कारण अलग तरह से महसूस करने का अवसर मिल सकता है।
लेकिन मैं इसे केवल महिला या पुरुष होने से जोड़कर नहीं देखती। संवेदनशीलता व्यक्ति के अनुभव, सोच और सबसे बढ़कर लोगों को ध्यान से सुनने की क्षमता से आती है।
एक अच्छे प्रशासक के लिए जरूरी है कि वह लोगों की बात को समझे, उनकी परेशानी को गंभीरता से ले और साथ ही कानून और नियमों के अनुसार निष्पक्ष निर्णय करे। मेरे लिए यही संवेदनशील और प्रभावी प्रशासन की पहचान है।
प्रश्न 4. आपके जिले में महिलाओं, बालिकाओं और परिवारों से जुड़े कौन-से विषय आपकी प्राथमिकता में हैं?

उत्तर: मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी महिला या बालिका को अपनी परिस्थिति के कारण अपने अवसरों से समझौता न करना पड़े।
इसलिए मेरी प्राथमिकता केवल योजनाओं को लागू करना नहीं, बल्कि यह देखना है कि उनका लाभ वास्तव में जरूरतमंद परिवार तक पहुंच रहा है या नहीं। बालिकाओं की पढ़ाई जारी रहे, स्कूल छोड़ने के पीछे के कारणों को समय पर पहचाना जाए और बाल विवाह जैसी स्थितियों को होने से पहले रोका जाए—इन पर विशेष ध्यान जरूरी है।
इसके साथ गर्भवती महिलाओं और बच्चों के पोषण एवं स्वास्थ्य, महिलाओं की सुरक्षा और जरूरतमंद परिवारों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ना भी महत्वपूर्ण है। खासकर दूरस्थ क्षेत्रों में आखिरी व्यक्ति तक सेवा पहुंचाना जिला प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी है।
मैं चाहती हूं कि हमारा दृष्टिकोण केवल समस्या आने के बाद कार्रवाई करने का न हो, बल्कि परिवारों के साथ लगातार काम करके समस्याओं को पहले ही पहचानने और रोकने का हो। मेरे लिए एक सफल प्रशासन वही है, जहां महिला और बालिका को अपने जीवन के फैसले लेने के लिए सुरक्षा, अवसर और जरूरी सहयोग—तीनों मिलें।
प्रश्न 5. कलेक्टर के रूप में अब तक आपके सामने सबसे चुनौतीपूर्ण स्थिति कौन-सी रही और उससे आपने क्या सीखा?
उत्तर: कलेक्टर के रूप में मेरी सबसे बड़ी सीख यह रही है कि कागज पर किसी योजना की प्रगति और जमीन पर उसका असर, दोनों हमेशा एक जैसे नहीं होते। कई बार रिपोर्ट में काम पूरा दिखाई देता है, लेकिन जब आप गांव में जाकर लोगों से बात करते हैं, तो पता चलता है कि अभी कुछ कमियां बाकी हैं। मेरे लिए यही सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौती रही है—इन दोनों के बीच का अंतर कम करना।
इसके लिए केवल समीक्षा बैठक काफी नहीं है। टीम को स्पष्ट जिम्मेदारी देना, सही जानकारी लेना और जरूरत पड़ने पर स्वयं मौके पर जाकर स्थिति समझना जरूरी है। कई बार समस्या किसी एक विभाग की नहीं होती; उसका समाधान कई विभागों और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर निकालना पड़ता है।
इस अनुभव ने मुझे सिखाया है कि कलेक्टर का काम हर समस्या को खुद हल करना नहीं, बल्कि सही लोगों को साथ लाकर समाधान की दिशा तय करना है। और अंत में प्रशासन की सफलता सिर्फ फाइल में नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि उससे लोगों के जीवन में वास्तव में कितना बदलाव आया।
प्रश्न 6. क्या महिला कलेक्टर होने के कारण आम महिलाओं और बेटियों से संवाद करना कुछ आसान हो जाता है?
उत्तर: कई बार ऐसा जरूर महसूस होता है कि महिलाएं और बेटियां, खासकर व्यक्तिगत या संवेदनशील मामलों में, महिला अधिकारी के सामने अपनी बात थोड़ी सहजता से रख पाती हैं। शायद उन्हें लगता है कि सामने वाला उनकी स्थिति को आसानी से समझ पाएगा।
लेकिन मेरे लिए असली बात लिंग से ज्यादा भरोसे की है। कोई भी नागरिक तभी खुलकर अपनी बात रखता है, जब उसे लगे कि उसकी बात सुनी जाएगी और उसे गंभीरता से लिया जाएगा। इसलिए मेरी कोशिश रहती है कि जनसुनवाई में केवल शिकायत दर्ज न हो, बल्कि उसकी पूरी बात समझी जाए और यह भी देखा जाए कि समाधान वास्तव में हुआ या नहीं। प्रभावी शिकायत निवारण (ग्रेविएंस रीड्रेसल) में समयबद्ध कार्रवाई और नागरिक की प्रतिक्रिया दोनों महत्वपूर्ण हैं।
मेरे लिए कलेक्टर के रूप में सुलभता का मतलब यही है कि लोगों को यह महसूस हो कि प्रशासन उनके लिए उपलब्ध है। महिला हो या पुरुष, गांव का व्यक्ति हो या शहर का—हर नागरिक को सम्मान से सुना जाए और जहां संभव हो, समाधान भी समय पर मिले। यही भरोसा धीरे-धीरे प्रशासन और जनता के बीच मजबूत संबंध बनाता है।
प्रश्न 7. प्रशासनिक निर्णयों में संवेदनशीलता और सख्ती—दोनों के बीच आप संतुलन कैसे बनाती हैं?
उत्तर: मेरे लिए संवेदनशीलता का अर्थ नियमों से समझौता करना नहीं है और सख्ती का अर्थ कठोर व्यवहार करना भी नहीं है। दोनों का सही संतुलन ही अच्छे प्रशासन की पहचान है।
किसी भी निर्णय से पहले मैं यह समझने की कोशिश करती हूं कि समस्या क्या है, उसका लोगों पर क्या असर पड़ेगा और क्या कोई व्यावहारिक रास्ता निकाला जा सकता है। लेकिन जब नियम और निर्णय स्पष्ट हों, तो उनके पालन में ढिलाई नहीं होनी चाहिए।
मेरा प्रयास रहता है कि व्यक्ति की परिस्थिति को समझते हुए निर्णय लिया जाए, लेकिन निर्णय के बाद उसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही भी तय हो। जहां किसी को सहायता की जरूरत है, वहां प्रशासन सहारा दे; और जहां जानबूझकर नियम तोड़े जा रहे हों, वहां निष्पक्ष और दृढ़ कार्रवाई हो।
मेरे लिए यही संतुलन है—व्यवहार में संवेदनशील, निर्णय में निष्पक्ष और कार्रवाई में दृढ़।
प्रश्न 8. आपके जिले की ऐसी कौन-सी पहल है, जिसे आप प्रशासन की एक खास उपलब्धि के रूप में देखती हैं?

उत्तर: मेरे लिए किसी पहल की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका शुरू होना नहीं, बल्कि यह है कि लोग उसे अपना समझने लगें। इसी सोच के साथ हमने कई कामों में महिलाओं, बालिकाओं और स्थानीय समुदाय को केवल योजना के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन का हिस्सा बनाने पर जोर दिया है।
मैदानी स्तर पर जब महिलाएं आगे आकर किसी समस्या की पहचान करती हैं, समाधान में सहयोग करती हैं और दूसरे परिवारों को भी जोड़ती हैं, तो उसका असर कहीं ज्यादा स्थायी होता है। ऐसे प्रयासों में प्रशासन की भूमिका केवल योजना देने की नहीं, बल्कि लोगों को साथ लेकर चलने की होती है।
मेरे लिए यह एक महत्वपूर्ण सीख और उपलब्धि है कि जब किसी पहल की जिम्मेदारी केवल प्रशासन की न रहकर समुदाय की भी बन जाती है, तो उसका परिणाम ज्यादा टिकाऊ होता है। यही वह बदलाव है जिसे मैं प्रशासन की वास्तविक सफलता मानती हूं।
प्रश्न 9. क्या कभी आपको लगा कि महिला अधिकारी होने के कारण अपनी क्षमता साबित करने के लिए आपको अतिरिक्त प्रयास करना पड़ा?
उत्तर: शुरुआत में कभी-कभी ऐसा जरूर लगा कि किसी निर्णय को स्वीकार करवाने के लिए थोड़ा अधिक संवाद करना पड़ा। लेकिन मैंने इसे अपने लिए चुनौती की तरह नहीं देखा। प्रशासन में हर अधिकारी को, खासकर नई जिम्मेदारी संभालते समय, अपनी कार्यशैली और निर्णयों के प्रति लोगों का भरोसा बनाना पड़ता है।
मेरे लिए इसका सबसे अच्छा तरीका रहा है कि बातों से ज्यादा काम को बोलने दिया जाए। निर्णय स्पष्ट हों, टीम के साथ संवाद हो और जो जिम्मेदारी ली है, उसका परिणाम दिखाई दे—तो धीरे-धीरे भरोसा बनता है।
आज भी मेरा मानना है कि अधिकारी की पहचान उसके लिंग (जेंडर) से नहीं, बल्कि उसके निर्णय, उसकी निष्पक्षता और जमीन पर दिखने वाले परिणामों से बनती है। आखिरकार लगातार अच्छा काम ही सबसे मजबूत परिचय है।
प्रश्न 10. आज की युवा लड़कियां प्रशासनिक सेवा में आने का सपना देख रही हैं। उन्हें आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर: मैं युवा लड़कियों से यही कहूंगी कि बड़ा सपना देखने से बिल्कुल न डरें। प्रशासनिक सेवा में आने के लिए मेहनत और धैर्य दोनों चाहिए, और रास्ते में असफलताएं भी आएंगी। उन्हें अपनी क्षमता पर भरोसा रखते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए।
लेकिन एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि प्रशासनिक सेवा सिर्फ एक अच्छी नौकरी या पद नहीं है। यह लोगों के जीवन को प्रभावित करने की जिम्मेदारी है। आपको ऐसे फैसले लेने होते हैं जिनका असर किसी व्यक्ति, परिवार या पूरे समुदाय पर पड़ सकता है।
इसलिए तैयारी सिर्फ परीक्षा पास करने की नहीं, बल्कि खुद को एक बेहतर और जिम्मेदार व्यक्ति बनाने की भी होनी चाहिए। पद मिलने के बाद पहचान आपके पद से नहीं, बल्कि इस बात से बनेगी कि आपके काम से कितने लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया।
और मेरी ओर से हर बेटी के लिए बस इतना—अपने सपनों को छोटा मत कीजिए। अगर आप योग्य हैं और मेहनत करने के लिए तैयार हैं, तो किसी भी जिम्मेदारी को अपने लिए असंभव मत मानिए।
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