“पेज-भात” का साथ और विकास का विश्वास, जब नारायणपुर की बेटी ने 25 किमी का ‘असंभव’ रास्ता पार कर लोकतंत्र को गाँव की चौपाल तक पहुँचाया
नई पहल न्यूज नेटवर्क। नारायणपुर|इसे कहते हैं कर्तव्य की पराकाष्ठा! छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के सबसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में से एक, नारायणपुर में कलेक्टर नम्रता जैन ने वह कर दिखाया जो अब तक नामुमकिन माना जाता था। अबूझमाड़ की दुर्गम वादियों और पहाड़ियों को चीरते हुए, जब कलेक्टर नम्रता जैन खुद बाइक हैंडल थामकर और फिर मीलों पैदल चलकर आलबेड़ा पहुंचीं, तो इतिहास के पन्नों में एक नया अध्याय जुड़ गया। यह दौरा केवल एक प्रशासनिक निरीक्षण नहीं था, बल्कि एक महिला अधिकारी का अपनी जनता के प्रति अटूट समर्पण था।

जब ‘साहब’ नहीं, ‘बेटी’ बनकर गांव पहुंचीं कलेक्टर
आजादी के 78 साल बाद भी जिस आलबेड़ा गांव तक जाने की हिम्मत व्यवस्था ने नहीं जुटाई थी, वहां कलेक्टर नम्रता जैन ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 25 किलोमीटर का वह रास्ता, जहां घने जंगल, उफनते नाले और तीखी पहाड़ियां कदम-कदम पर चुनौती दे रही थीं, वहां कलेक्टर ने साबित किया कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति के आगे प्रकृति भी नतमस्तक हो जाती है। कई जगहों पर जब बाइक का रास्ता खत्म हुआ, तो उन्होंने खुद पैदल मार्च किया और पसीने से तर-बतर होकर भी मुस्कुराते हुए ग्रामीणों के बीच पहुंचीं।
पहाड़ी जीवन का अहसास: जमीन पर बैठकर खाया ‘पेज-भात’
दौरे की सबसे मार्मिक तस्वीर तब उभरी जब कलेक्टर नम्रता जैन ने किसी लग्जरी व्यवस्था की मांग करने के बजाय, ग्रामीणों के साथ जमीन पर बैठकर उनके पारंपरिक भोजन ‘पेज-भात’ का आनंद लिया। ग्रामीणों के लिए यह दृश्य अविश्वसनीय था—जिन्होंने कभी जिले के सबसे बड़े अधिकारी को करीब से नहीं देखा था, आज वह उनके साथ एक ही थाली से जुड़ाव महसूस कर रही थीं। नम्रता जैन की इस सादगी ने प्रशासन और जनता के बीच की खाई को एक झटके में पाट दिया।
ऑन-द-स्पॉट फैसले: “फाइलों में नहीं, जमीन पर चाहिए सड़क”
जनचौपाल में जब ग्रामीणों ने वर्षों से उपेक्षित पड़े अपने गांव की व्यथा सुनाई, तो कलेक्टर के तेवर सख्त नजर आए। उन्होंने अधिकारियों को दो टूक कहा— “अगर मैं यहां तक पहुंच सकती हूं, तो विकास की किरणें क्यों नहीं?” उन्होंने मौके पर ही निर्देश दिए:



- सड़क और कनेक्टिविटी: प्राथमिकता के आधार पर आलबेड़ा को कस्तूरमेटा से जोड़ने वाली सड़क का खाका तैयार हो।
- स्वास्थ्य एवं शिक्षा: गांव में नियमित स्वास्थ्य शिविर और जर्जर स्कूल भवनों के उद्धार के आदेश।
- पेयजल: पहाड़ी झरनों के भरोसे रहने वाले ग्रामीणों के लिए सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था।
एक मिसाल जो प्रेरणा बनेगी
कलेक्टर नम्रता जैन का यह दौरा ब्यूरोक्रेसी के लिए एक सबक है। उन्होंने यह संदेश दिया है कि विकास केवल वातानुकूलित कमरों में बैठकर नहीं, बल्कि धरातल की धूल फांकने से आता है। आलबेड़ा की पथरीली राहों पर उनके बढ़ते कदम यह भरोसा दिलाते हैं कि अब बस्तर के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को भी न्याय और अधिकार मिलेगा।
मेरी कोशिश सिर्फ गांव तक पहुंचना नहीं, बल्कि व्यवस्था को ग्रामीणों के विश्वास तक पहुंचाना है। आलबेड़ा अब उपेक्षित नहीं रहेगा।
— नम्रता जैन, कलेक्टर




