
नई पहल न्यूज नेटवर्क। रायपुर। छत्तीसगढ़ में कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ ने शासन की उपेक्षा, कर्मचारियों की भारी कमी और संसाधनों के अभाव को लेकर “संसाधन नहीं तो काम नहीं” नारे के साथ चरणबद्ध आंदोलन का ऐलान कर दिया है। संघ की ओर से 17 सूत्रीय मांग पत्र के साथ आंदोलन की रूपरेखा जारी की गई है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि अगर शासन द्वारा मांगों पर ठोस पहल नहीं की गई, तो अधिकारियों को अनिश्चितकालीन हड़ताल के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
ऐसे चलेगा आंदोलन का क्रम

संघ ने आंदोलन को चार चरणों में विभाजित किया है:
🔸 पहला चरण – 17 जुलाई:
जिला कलेक्टरों के माध्यम से ज्ञापन सौंपा गया।
🔸 दूसरा चरण – 21 से 26 जुलाई:
निजी संसाधनों से कार्य पूरी तरह बंद किया जाएगा।
🔸 तीसरा चरण – 28 से 30 जुलाई:
28 जुलाई: जिला स्तर पर सामूहिक अवकाश लेकर विरोध प्रदर्शन
29 जुलाई: संभाग/राज्य स्तर पर सामूहिक अवकाश और प्रदर्शन
30 जुलाई: राजधानी रायपुर में प्रदेश स्तरीय विरोध प्रदर्शन
🔸 अनिश्चितकालीन हड़ताल:
यदि शासन ने पहल नहीं की, तो अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार किया जाएगा।

क्या हैं प्रमुख 17 मांगे :
संघ ने जो 17 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा है, उनमें कुछ प्रमुख मांगे इस प्रकार हैं:
- हर तहसील में सभी स्वीकृत पदों की तत्काल पदस्थापना – कंप्यूटर ऑपरेटर से लेकर पटवारी तक।
- तहसीलदार से डिप्टी कलेक्टर पद पर पदोन्नति की पुरानी 50:50 नीति लागू की जाए।
- नायब तहसीलदार को राजपत्रित अधिकारी घोषित किया जाए।
- लंबित ग्रेड पे सुधार तत्काल किया जाए।
- सभी तहसीलों में शासकीय वाहन व चालक की व्यवस्था या वाहन भत्ता मिले।
- निलंबित अधिकारियों की जांच 15 दिन में पूरी कर बहाली हो।
- न्यायालयीन आदेशों पर FIR दर्ज न हो – न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित हो।
- प्रोटोकॉल ड्यूटी से अलग न्यायालयीन कार्य हेतु समय और व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
- आउटसोर्सिंग से स्टाफ की नियुक्ति का अधिकार तहसीलदार को मिले।
- फील्ड भ्रमण और सुरक्षा हेतु सुरक्षाकर्मी व वाहन दिए जाएं।
- SLR/ASLR की भू-अभिलेख कार्यों में पुनः बहाली की जाए।
- पदेन शासकीय मोबाइल नंबर दिए जाएं ताकि व्यक्तिगत नंबर की गोपनीयता बनी रहे।
- तत्काल राहत राशि हेतु स्पष्ट गाइडलाइन बनाई जाए।
- संघ को शासन के समक्ष वार्ता व पत्राचार में मान्यता दी जाए।
- राजस्व न्यायालय सुदृढ़ीकरण हेतु विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए।
संघ का स्पष्ट संदेश – सुविधाएं नहीं, तो सेवाएं नहीं
संघ पदाधिकारियों का कहना है कि शासन बिना संसाधनों के पूरे सिस्टम को चलाने की अपेक्षा रखता है, लेकिन कर्मचारी हर स्तर पर बोझ झेल रहे हैं। वे न्यायालय, कानून व्यवस्था, फील्ड वर्क, रिपोर्टिंग और जनसेवा – हर मोर्चे पर लड़ रहे हैं, पर न वाहन हैं, न स्टाफ, न तकनीकी सहयोग।
यह आंदोलन अब सिर्फ मांगों का नहीं, सिस्टम को संभालने की हदों का सवाल बन चुका है।
“संसाधन नहीं तो काम नहीं” का यह नारा केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान प्रशासनिक ढांचे की जमीनी हकीकत को उजागर कर रहा है।
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