
“सोना, सज्जन, साधु जन टूट जुड़े सौ बार।
दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एके धरा दरार…”
कष्ट जीवन का हिस्सा हैं। हर किसी को अपने हिस्से के दुख, संघर्ष और टूटन से गुज़रना पड़ता है। लेकिन वही व्यक्ति विजेता कहलाता है, जो नियति के कठोर वारों के बाद भी बार-बार खड़ा होता है।

यही सोच लेना कि “अब कुछ नहीं हो सकता” – आत्मसमर्पण है, जबकि बार-बार उठ खड़ा होना ही असली विजय है।
जीवन सबसे बड़ा गुरु है, और सच्चा शिष्य वही है जो हर हार के बाद फिर से प्रयास करे, फिर से खड़ा हो – न केवल जीवन के सामने बल्कि अपने आत्मबल के सामने भी।
टूटना कोई हार नहीं,
जुड़ना ही असली ताक़त है।


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