आईएएस संजीव झा की पहल बना जनआस्था का उत्सव: कावड़ यात्रा बनी बलरामपुर-रामानुजगंज की पहचान
तातापानी तपेश्वर धाम में सावन के पहले सोमवार को उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, झारखंड तक से पहुंचे भक्त

नई पहल न्यूज नेटवर्क। बलरामपुर-रामानुजगंज। सावन के पहले सोमवार को तातापानी तपेश्वर धाम में भक्ति की ऐसी बयार बही कि पूरा नगर भक्ति रस में डूब गया। माँ महामाया मंदिर छठ घाट कन्हर नदी से जल लेकर हजारों कावड़िये 16 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर शिवधाम तातापानी पहुंचे, और भोलेनाथ को जल अर्पित किया। सुबह 5 बजे से ही श्रद्धालुओं का सैलाब छठ घाट पहुंचने लगा था, और 7 बजे के बाद मंदिर परिसर में मेले जैसा माहौल बन गया। दूर-दराज़ गांवों के साथ-साथ झारखंड सीमा से भी भारी संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा में सम्मिलित हुए।
संजीव झा की पहल से बनी परंपरा, जो आज जनभक्ति बन गई

कुछ वर्ष पूर्व बलरामपुर-रामानुजगंज के तत्कालीन कलेक्टर संजीव झा ने इस कावड़ यात्रा की आधिकारिक और सांस्कृतिक शुरुआत की थी। रामानुजगंज में छठ घाट को जल स्रोत के रूप में चुना गया और बलरामपुर में शिवगढ़ी चनान नदी से जल उठाने की परंपरा शुरू हुई, जो आज एक विराट जनचलन में बदल चुकी है। संजीव झा की इस दूरदर्शी पहल ने एक भक्ति परंपरा को जन्म दिया, जो अब साल दर साल विस्तार पा रही है और क्षेत्रीय आस्था का स्थायी प्रतीक बन गई है। आईएएस संजीव झा वर्तमान में शिक्षा विभाग में उप संचालक के पद पर पदस्थ है।
बाजे-गाजे के साथ निकले श्रद्धालु, नंगे पांव 16 किमी का सफर
कावड़ यात्रियों में महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की संख्या उल्लेखनीय रही। लोग समूहों में ढोल, मंजीरा, झांझ-मृदंग के साथ नंगे पांव हर-हर महादेव के जयकारों में लीन होकर चलते दिखे। मां महामाया मंदिर के पुजारी जितेंद्र पांडेय द्वारा विधिवत पूजा के बाद कावड़ियों को रवाना किया गया।
पुलिस और गोताखोर दल तैनात, सुरक्षा रही चाक-चौबंद
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस उप निरीक्षक निर्मल प्रसाद राजवाड़े, प्रधान आरक्षक विजय गुप्ता सहित पुलिस बल मौके पर तैनात रहा। गोताखोर दल नदी में किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए मुस्तैद रहा।
झारखंड से आए कावड़ विक्रेता, बना श्रद्धा के साथ जीविका का भी माध्यम
सावन के पहले सोमवार को हर साल की तरह इस वर्ष भी झारखंड से कावड़ विक्रेता पहुंचे और सुबह 6 बजे से ही मंदिर के पास अपनी दुकानें सजा लीं।
भीड़ के कारण पूरा क्षेत्र एक विशाल मेले में तब्दील हो गया।
परंपरा, पहल और पहचान : तीनों का संगम
यह कावड़ यात्रा सिर्फ भक्ति नहीं, एक प्रशासनिक सोच और सांस्कृतिक चेतना का परिणाम है।
आईएएस संजीव झा द्वारा शुरू की गई पहल ने इस यात्रा को जनआस्था का उत्सव बना दिया।
यह यात्रा आज न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक समरसता का पर्व बन चुकी है।
“जहाँ श्रद्धा नंगे पाँव चलती है, वहाँ शिव खुद स्वागत में खड़े होते हैं। संजीव झा की पहल ने जो कावड़ यात्रा शुरू की, वह अब हर दिल की आवाज़ बन चुकी है।”


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