मीडिया की विश्वसनीयता और नैतिकता अब कठघरे में

भारतीय पत्रकारिता का गौरवशाली अतीत लोकमंगल, राष्ट्रभक्ति और जनसेवा जैसे मूल्यों से परिपूर्ण रहा है। किंतु आज का यथार्थ इससे बिल्कुल अलग है। मीडिया अब अपनी भूमिका को लेकर संकट में है—वह समाचार देगा या विचार थोपेगा? सूचना देगा या माहौल बनाएगा? पत्रकार रहेगा या एक्टिविस्ट बन जाएगा? आज की पत्रकारिता में ‘एजेंडा पत्रकारिता’ और ‘नैरेटिव सेटिंग’ जैसे शब्द आम हो गए हैं। परिणामस्वरूप, मीडिया की नैतिकता और उसकी प्रामाणिकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
टीवी चैनलों का हल्ला-गुल्ला अब पत्रकारिता नहीं, विचारधारा का युद्ध बन चुका है। ‘न्यूज चैनल’ अब ‘व्यूज चैनल’ में बदल गए हैं। सोशल मीडिया ने आम आदमी को अभिव्यक्ति का मंच तो दिया है, पर बिना ज़िम्मेदारी के इस शक्ति ने सूचनाओं को संदेहास्पद बना दिया है।

पत्रकार या आंदोलनकारी—फासला ज़रूरी है
पत्रकार का काम है सूचना देना, न कि उसका पक्ष लेकर प्रचार करना। एक्टिविस्ट किसी विचारधारा के तहत लड़ता है, जबकि पत्रकार को तथ्यों की रोशनी में सिर्फ सत्य को सामने लाना होता है। यहां स्व. प्रभाष जोशी का कथन याद आता है— “पत्रकार की राजनीतिक सोच हो सकती है, लेकिन उसकी कोई पार्टी लाइन नहीं होनी चाहिए।” आज स्थिति उलट है। बहुत से पत्रकार एक्टिविस्ट की तरह व्यवहार कर रहे हैं, जिससे मीडिया की छवि धूमिल हो रही है। हालाँकि, आज भी बड़ी संख्या में पत्रकार अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन कर रहे हैं, किंतु मुठ्ठीभर एजेंडा-धारी पत्रकार पूरी बिरादरी को कलंकित कर रहे हैं।

सोशल मीडिया: शक्ति या संकट ?
तकनीक ने संवाद की रफ्तार को तो बढ़ा दिया है, लेकिन गुणवत्ता गिरा दी है। हर व्यक्ति अब कम्युनिकेटर है, लेकिन प्रामाणिक पत्रकार नहीं। संपादन, तथ्य-जांच और ज़िम्मेदारी जैसी चीजें खत्म हो रही हैं। ‘फेक न्यूज़’ अब संगठित कारोबार बन चुका है। सोशल मीडिया का लोकतंत्र सकारात्मक पहलू है, लेकिन इसकी बेलगाम प्रवृत्ति पत्रकारिता के मानदंडों को कमजोर कर रही है। यही कारण है कि आज भी फेसबुक और यूट्यूब सबसे ताकतवर मीडिया प्लेटफॉर्म हैं, बावजूद इसके कि ये खुद कोई कंटेंट निर्माण नहीं करते। वे सिर्फ हमारी मेहनत को कैश करते हैं।
समाधान : मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता की वापसी
मीडिया में आज जो सबसे बड़ी जरूरत है, वह है विश्वसनीयता और प्रामाणिकता की बहाली।
हमें सत्याधारित पत्रकारिता की ओर लौटना होगा, न कि एजेंडा आधारित प्रचारतंत्र की ओर।
समाज यदि चाहता है कि मीडिया निष्पक्ष रहे, तो उसे भी उसकी स्वतंत्रता और स्वावलंबन के लिए समर्थन देना होगा। सवाल यह है कि मीडिया को अब आत्मावलोकन की आवश्यकता है। जब माध्यम स्वयं सवालों के घेरे में हों, तब समाज का भरोसा जीतना एक कठिन चुनौती बन जाता है।
निष्कर्ष : पत्रकारिता को फिर से पवित्र बनाएँ
आज जब सूचनाएं ही संदेह के घेरे में हैं, पत्रकार की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है। मीडिया को तय करना होगा कि वह समाज को जागरूक करेगा या भटकाएगा।
यदि किसी पत्रकार के भीतर एक्टिविस्ट बनने की तीव्र इच्छा है, तो बेहतर है कि वह पत्रकारिता छोड़कर जनांदोलन में कूद पड़े—मंचों को भ्रमित न करे। पत्रकारिता सिर्फ एक पेशा नहीं, जनसेवा और सत्य की साधना है। जो इसे समझे, वही सच्चा पत्रकार है।
लेख का सार :
पत्रकारिता को फिर से नैतिकता, जिम्मेदारी और सत्य की राह पर लाने की आवश्यकता है। एक्टिविज़्म और पत्रकारिता के बीच की रेखा अगर धुंधली हो गई, तो मीडिया न केवल अपने मूल से भटकेगा, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को भी कमजोर करेगा।


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