कवि सुरेंद्र दुबे के निधन से छत्तीसगढ़ में शोक की लहर
रविकांत सिंह राजपूत। रायपुर। छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू, गांव की गलियों की सच्चाई और व्यंग्य की धार रखने वाले देश के चर्चित पद्मश्री हास्य कवि डॉ. सुरेंद्र दुबे अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन से साहित्य और समाज दोनों ने एक अनमोल रत्न खो दिया है।

उनके पुत्र आशुतोष दुबे का वह नारा—”अऊ नहीं साहिबों, बदल के रहीबो”—सिर्फ एक चुनावी नारा नहीं था, बल्कि व्यवस्था से टकराने का जनस्वर था। यह नारा सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक गूंजा और सत्ता परिवर्तन की कहानी में इतिहास बना गया।

आज जब सुरेंद्र दुबे इस दुनिया से विदा ले चुके हैं, तो यह नारा और भी अधिक अर्थपूर्ण हो गया है। यह केवल उनके बेटे की राजनीतिक आवाज़ नहीं थी, बल्कि उसी विचारधारा की गूंज थी, जिसे सुरेंद्र दुबे ने अपनी कविताओं और व्यंग्य रचनाओं से हमेशा जीवित रखा।
उनका जाना एक युग का अंत है। पर शब्द कभी मरते नहीं, और नारे कभी थमते नहीं—
“बदल के रहीबो” अब एक विचार है, एक विरासत है, जो हर अन्याय के खिलाफ उठेगी।
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