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कमर तक आते बाल… ज्यादा गोरा नहीं पर ठीक ठाक सा रंग… संभला हुआ सा जिस्म … कहीं से बेडौल नहीं… हर लड़के को अपनी मां से मिलवाने के लिए जैसी लड़की चाहिए वैसी मैं… लग भग-लग भग सभी बैच और सभी लड़को के ग्रुप में 3-4 तो ऐसे लड़के मिल ही जाएंगे जो मन ही मन मोहब्बत में थे मेरी… ऐसा लग रहा है क्या की इतरा रही हूं ???? (हल्की सी हंसी) आज इतरा रही हूं पर पहले ऐसी नहीं थी… मेरे कानों तक भी ये बात कहीं न कही से पहुंच जाया करती थी या कोई न कोई खुस फुसा के बता दिया करता था की देख देख ये वही लड़का है जो तुझे देखता रेहता है… और ये भी पता था की उन में एक दो मन चले प्रोफेसर्स भी शामिल हैं… करन जौहर की किसी टिपिकल फिल्म को सन 2000 में ले जाऊं न.. तो बस समझ लो वैसा ही कुछ फील आ जाए… वैसे बता दूं की बहुत गधी थी मैं … ऐसा हमारे हॉस्टल की लड़कियां कहती थीं… उस वक्त सेकन्ड इयर में थी और मुझे ये तक नहीं पता था की डेट में आखिर होता क्या है ?.. मैंने वैशाली (उस टाईम मेरी अच्छी फ्रेंड हुआ करती थी) से पूछ लिया… ऐ वैशाली यार ये इतने इतने घनटे रोज रोज लोग डेट पे करते क्या हैं.. मन नहीं भरता इतनी बाते करके ? … उस कुतिया ने पूरी क्लास में मेरा मजाक बना दिया था… खेर.. ये तो मै proof दे रही थी की मैं किस लेवेल की गधी थी… तब मेने नया नया थियेटर गुर्प जुआईंन किया था… और कविताओं की संगोषठी वाला एक प्ले कर रही थी… वो एक एक्सपेरिमेंट था इसलिए बहुत सारे लोग रिहरसर्ल देखने आते थे.. और सच बोलू तो तब मुझे ये बिल्कुल नहीं पता था की उन लोगो में से कुछ लोग तो बस ऐं वें ही मुझे देखने के लिए आते हैं.. क्यों की मैं तो गधी थी… और इसमें अलग कुछ भी नही था.. आप को भी मेरी बात से यही लगना लाज़मी है.. पर जाने अन-जाने कोई बहुत पीछे से… दूर कहीं खामोशी से… बिना मेरा ध्यान खींचे… टक-टकी बांध कर सबकी नजरों से बच कर मुझको… सिर्फ मुझको ही नहीं … मेरे हाथों के हाओ भाओ को .. आवाज के उतार चढ़ाव को.. गले की हड्डी (जिसे हम beauty bone कहते है ) उस तक को निहार रहा था… हम्म्म् अजीब लगा न सुन कर… मुझे भी… बहुत अजीब लगा … जब ये सब मैने उसी के मूंह से सुना… वो भी… 21 साल बाद…
उसने कभी मेरा नाम नहीं लिया… मुझे छुआ नहीं… मुझे याद नहीं की सही से कभी आंखो में आंखे डालके बात करने की जुर्रत भी सही से की के नहीं… एक लिहाज़ हमेशा बरकरार रखा…. मेम जो कहता था….(हल्की सी हंसी) न पढ़ाती नहीं थी.. जूनीयर था मेरा… सचिन..
कॉलिज से निकल जाने के बाद उससे कभी बात नहीं हुई.. और न ही कभी कॉलिज में ऐसी कभी कोई खास बात… और मैं सिर्फ अपने batch mates के अलावा ज्यादा किसी से बात करती भी नही थी… पर सचिन जहां तक मुझे याद था अच्छा cute सा लड़का था… प्ले में हमेशा back stage काम करता था… ज्यादा height नहीं थी… मेरे जितनी ही थी… 5 या थोड़ी ज्यादा… बस इतना ही याद था वो मुझे…
एक दिन इक अजीब सा इत्तेफाक हुआ… सन 2020 दिसम्बर 31….. समझो कुछ ऐसा हुआ था की बुहत शिद्दत से दिल कर रहा था की खुदा बस मेरा हाथ थाम ले बहुत उदास और मायूस थी मैं उस रोज़ रोई भी खूब थी… मोबाईल पर कॉल आया … मैम … मैं सचिन.. सचिन श्रिवास्तव… आपका जूनियर…
भरे गले को संभालते हुए मैंने कहा… हआ अअअ…. सचिन…. हाए… कैसे हो…. उधर से वो वैसा ही बड़ा बेसबरा सा … अच्छा हूं मैम पेहचाना तो न आपने … मैनें भी अपनाईयत भरे अंदाज में कहा बिल्कुल पहचाना बाबा… और बताओ कैसे याद आ गई… भूला कब था… उसने ऐसे कहा जैसे जबान की नोक पर ये जवाब रख कर बैठा था… मैं हंस पड़ी… तब उसने कहा की उसने आज पुरानी कुछ फाईले खोलीं तो उसको मेरे प्ले की फोटो कॉपी मिली … मैंने पूछा कौन सा प्ले.. उसने कहा वही मैम जिसमें आप सफेद सूट पहनी थीं… चार रंग के दुपट्टे बदलती थी… पहला गुलाबी.. फिर पीला.. फिर नीला और फिर लाल…. मैं तो फुल हैरान… मेरा तो 2020 तक बच्चे वच्चे पाल कर दुनिया की रोलर कोस्टर राइड ले कर गजिनी मोड ऑन हो चुका था.. गजिनी मोड मतलब… short term long term कोई सी भी मेमोरी लॉस हो जाना और उसको इनजाए भी करना… anyways मुझे तो याद ही नहीं ता ये कौन से प्ले की बात कर रहा है.. इतने वो बोल पड़ा की मैम प्लीज़ आपकी बग़दाद की लड़की वाली लाइने सुनाइये न .. बहुत मन कर रहा है… frustrated तो थी ही .. मैने थोड़ी टोन चेंज की और कहा देखो सचिन मुझे अब ये सब छोड़े हए बहुत टाईम हो गया.. मुझे कुछ.. अपनी बात पूरी भी नही की थी और … दूसरी तरफ से वो बोलता चला गया..
एक गली..जो ऊंची दीवारों से के साये में शहर घीमती थी..
और..गली में.. सिर पर.. फीरोजी रूमाल बांधे एक लड़की..
अब उसे याद करोगे तो वो याद आएगी.. अब तम्हारी याद ही उसका बगदाद है..
तुम्हारी याद ही उसकी गली है… उसकी उम्र है उसका फीरोजी रूमाल ….
जो भाग चुकी है .. हर गली और घर से …
मैं एक दम खामोश थी.. सुन्न… कुछ कुछ झलकियां आई गयीं सामने से बस… मैं stage पे ही थी… फिर आवाज आई.. मैम.. और कुछ सेकेंड के लिए मेरे रोंगटे खड़े हो गए.. पता नहीं क्यों… नहीं समझ पाई… उसने कहा आप सुन रही थी न… मैंने बस हूं.. कहा.. फिर मैंने कहा तुम आज यही सब कर रहे हो क्या.. किस किस को सब पढ़ कर सुना दिया… उधर से फिर चौकाने वाला जवाब आया.. बस आप .. मुझे नहीं मालूम क्यों पर खुद को रोक नहीं पाया आज मैं… आज मुझे आप बहुत याद आ रही हो… मैं अपनी डेल मिटाते हुए हस पड़ी… अच्छा क्यों… हसते हुए बोला बता दूंगा तो गुस्सा करोगी.. वैसे भी आपसे बहुत डर लगता है.. ये बताओ भोपाल कब आ रही हो.. मैने कहा पता नही.. बोला… जब भी आओगी वादा करो मिले बगैर नहीं जोओगी…. मैंने भी कह दिया हां ठीक है..
फिर कुछ दिनों बाद भोपाल जाना भी हुआ …वो अब क्यूट सा सचिन तो बिल्कुल भी नहीं लग रहा था… थोड़ा अजीब दिख रहा था… आधे से ज्यादा बाल सफेद थे… देख के ऐसा लग रहा था की अच्छे से cigarette और शराब की लत से जूझता हुआ खां-म-खां का क्रांतीकारी पत्रकार हो चुका है… पर एक चीज तब भी नहीं बदली थी .. उसकी आंखो का वो लिहाज.. उस वक्त भी अगर बातें करते करते मेरी और उसकी आंखे कुछ देर एक दूसरे पर रुक गईं… तो वो ही आंखे नीचे कर ले रहा था… और एसा मैं जान बूझ कर कर रही.. थी… सिर्फ उसको टटोलने के लिए… उसके बाद में वापिस अपने शहर आ गई… अकसर उसके कॉल आने लगे और वो थोड़ा खुलने लगा… बातों से लगा दुनिया बदलने निकला क्रांतिकारी पत्रकार अपनी छोटी सी एक बच्चे और कभी आती कभी नही आती वाली कमाई से तंग आ चुकी बीवी को सुवाहा कर चुका है.. दोस्त भी अपने अपने ठीये पर लौट गए थे क्योंकी पीने-पिलाने के पैसे ही नही बचे थे…
बहुत दिनों से मुझसे वादा किये जा रहा था की मैम मैं आपसे मिलने जब आपके शहर आऊंगा तो मिलोगी तो न… पूरा पूरा टाईम तो दोगी न.. ये तो नही कहोगी.. जॉब की वजह से बिज़ी हूं… मेने भी हर बात की हामी भर दी थी की जब आएगा देखा जाएगा… 2-3 साल तो बस आऊंगा-आऊंगा में ही चले गए.. इस बीच कॉल्स का सिलसिला जारी रहा और उसने धीरे धीरे अपने दिल की बाते मुझे बताना शुरू कीं… तब मुझे पता चला की.. इसको मुझसे ज्यादा मेरे प्ले की लाइन कैसे याद थीं.. कैसे पता था की मैने कब कब कौन सा दुपट्टा बदला… क्यों की वो ही था जिसे सीन चेंज होने पर मैं दुपट्टा उतार के देती थी… तब उसको वो मेरी so called beauty bone दिखती थी… हो सकता है नजर उसकी कहीं और भी जाती हो और जिक्र उसने सिर्फ beauty bone का किया हो… बहुत वाजिब है.. लड़का है.. लेकिन आज भी मेरा दिल कहता है की उसने कहीं और नहीं देखा होगा… लड़कियों का ये sense बहुत strong होता है… खैर… अब वो पूरा का पूरा खाली हो चुका है… अब उसे मेरा कोई डर भी नहीं है… झिझक भी नहीं है की मैं बुरा मान गई तो क्या… घंटों मुझे घूरने को भी तौयार है… आंखो में आखें डाल के… दबे छिपे अलफाजों में ही सही पर खुल के बता चुका है की आज भी उन 3-4 ग्रुप में खड़े मनचलो के ग्रप में नहीं है… दूर खड़ा इंतेजार मे है.. गलत कह गई… अब इंतेजार करने को तैयार नहीं… ज़िद में है… मेरा नाम लेकर मेरे गले लगना है बस….
सुन कर अजीब सा नही लगा… मुझे नहीं लगा… क्यों की मुझे पहले से ही पता था की मेरा नाम और मैं हमेशा से उसके लिए fascination ही है… और मैं उसे या उससे कभी अब शायद मिलूंगी भी नहीं… क्यों वो जा रहा है…. इस सफर की ओर वो बहुत पहले ही कदम बढ़ा चुका था…
और मैं… मैं.. ‘सहर’ हूं….. मेरा बहुत कम वक्त मुक़र्र है…. मैं सहर हूं….
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