
✒️ छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के प्रतिष्ठित छत्तीसगढ़ महतारी मंदिर में हुई चोरी की वारदात ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। यह केवल कुछ हजार रुपये की चोरी नहीं, बल्कि हमारे संस्कार, आस्था और सामाजिक ताने-बाने पर सीधा प्रहार है। जब किसी प्रदेश की सांस्कृतिक आत्मा – “छत्तीसगढ़ महतारी” – के प्रतीक मंदिर तक सुरक्षित नहीं रह जाते, तो यह घटना सिर्फ कानून व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना के सो जाने का संकेत बन जाती है। नकाबपोश चोर मंदिर में प्रवेश करता है, घुटनों के बल चलता है, दान पेटियों को खींचकर ले जाता है, और मंदिर के पीछे जाकर बेखौफ होकर उसमें से पैसे निकालता है। ये दृश्य न सिर्फ शर्मनाक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि चोरों में अब प्रशासन का कोई डर नहीं बचा।
सीसीटीवी में सब कुछ साफ-साफ नजर आता है, फिर भी अपराधी फरार है—यह पुलिस तंत्र की कमजोरी नहीं तो और क्या है? यह कोई पहली घटना नहीं है। धमतरी जिले में बीते कुछ ही सप्ताहों में चार से अधिक मंदिरों में चोरी की घटनाएं हो चुकी हैं। चरण पादुका जैसे पवित्र प्रतीकों तक को चोरों ने नहीं बख्शा। अब सवाल यह है कि क्या मंदिर प्रशासन, स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधि मिलकर किसी ठोस सुरक्षा व्यवस्था की योजना बनाएंगे, या फिर यह भी एक सामान्य अपराध की तरह फाइलों में दब जाएगा?
छत्तीसगढ़ महतारी केवल एक देवी नहीं, हमारी मातृभाषा, संस्कृति और पहचान की प्रतीक हैं। उनके मंदिर में इस तरह की घटना होना, उस विचारधारा पर चोट है जिसे छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान कहा जाता है।
मंदिर कोई बैंक नहीं कि वहां करोड़ों की सुरक्षा होनी चाहिए, लेकिन यह वह स्थान है जहाँ जनता अपने विश्वास, मेहनत की पूंजी और भावनाएं समर्पित करती है। उस भावनात्मक संपत्ति की रक्षा करना केवल पुलिस की नहीं, समाज की भी जिम्मेदारी है।

इस त्वरित टिप्पणी के माध्यम से “नई पहल” प्रशासन से यह मांग करता है कि—
सभी प्रमुख मंदिरों में सुरक्षा गार्ड, हाई क्वालिटी सीसीटीवी कैमरे और रात्रि गश्त अनिवार्य की जाए।
ऐसे मामलों की तेज कार्रवाई कर दोषियों को सख्त सजा दी जाए, ताकि यह उदाहरण बने।
मंदिर समितियों को तकनीकी और कानूनी रूप से सशक्त बनाने की योजना सरकार तत्काल तैयार करे।
अंततः, यह घटना केवल मंदिर में चोरी की नहीं, हमारे सामूहिक दायित्वों की परीक्षा है। सवाल सिर्फ प्रशासन से नहीं है, हम सब से है—क्या हम अपनी आस्था, संस्कृति और परंपरा की रक्षा को लेकर सजग हैं ?
अब समय है, चेतने का। नहीं तो अगली बार केवल दान पेटी नहीं, हमारी पहचान भी खतरे में होगी।


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